वैचारिक महाकुंभ

फिर से न जला देना

ना फिर से आग लगा देना, इस प्यारे से चमन में...। बड़ी शिद्दत से पनपे हैं अंकुर अभी सौहार्द के, कलियाँ भी खिली-खिली हैं ले प्रेम की बांहों का साथ, भरे हैं घाव बैर-भाव के जो हो चुके थे बहुत गहरे, खून की नदियाँ ना बहा देना इस चहकते मधुबन में...। उन्नति के सोपान चढ़ जो बड़े सजऱ बन चुके थे, मन ...

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कुण्डलियाँ

घर का भेदी खोल के,नंगा बैठा न्याय, गीदड़ बग्गी,भेड़िया,नोंच-नोंच अब खाय नोंच-नोंच अब खाय,लिए दानवता मन से, मन का ये उदगार,उगलते जहर वमन से देखें दृश्य 'विराट',काँपता है तन थर-थर, सबल बनाएं देश,टूटने दें मत यह घर॥                      #श्रीमन्नारायणाचार्य ‘विराट’

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अश्क

आज आसमाँ भी रोया मेरे हाल पर और, अश्कों से दामन भिगोता रहा। वो तो पहलू से दिल मेरा लेकर गए और,  मुड़कर न देखा,मैं अब क्या करुं॥ उनकी यादें छमाछम बरसती रहीं, मन के आंगन को मेरे भिगोती रहीं। खून बनकर गिरे अश्क रुखसार पर, कोई पोंछे न आकर,मैं अब क्या करुं॥ मैं तो शमा ...

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इंसान तेरी इंसानियत

इंसान तेरी इंसानियत को डूबते देखा है, दूसरों की बुराइयों को ढूंढने वाले तेरे खुद की नीयत को बदलते देखा है। इंसान तेरी इंसानियत...॥ शिकवा करें किससे,कि सिकन्दर ही साबुत नहीं। घुटकर रह जाती,सच्चाई कण्ठ पर, दिखता है,कोई महफूज नहीं॥ कसक कसौटी की विलाप यहाँ, झर-झर के आँसू को,बहते देखा है। इंसान तेरी इंसानियत...॥ पता है हमें आतंकी भी तू ...

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खिलखिलाते बच्चे

कुछ आशाओं,कुछ सपनों को संजोते ये खिलखिलाते बच्चे, कभी जानी-पहचानी तो कभी अनजानी राहों पर उन्मुक्त हो, दौड़ते ये खिलखिलाते बच्चे। न ईर्ष्या,न द्वेष इन्हें किसी से, प्यार से दिल जीतते ये खिलखिलाते बच्चे। पर न जाने किस बोझ तले अंधेरी गलियों में गुम होते, चमचमाते खिलौनों से खेलते,अपने प्यारे से खिलौनों से दूर बहुत दूर ...

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सर्दी बड़ी बेदर्दी

सर्दी ने मचाई गुंडागर्दी, पहनकर शीतलहर की वर्दी। क्या बच्चे-बूढ़े,क्या जवान, थर-थर कांप रहे ऐसी सर्दी॥ दूध संग पीएं खारक-हल्दी, शरीर रहे बच्चों सदा हेल्थी। गरमागरम जलेबी,गराडू भी, खूब भाते आती है जब सर्दी॥ मम्मी कहे सो जा बेटा जल्दी, रजाई,कंबल है हमारे हमदर्दी। सूरज दादा भी लेट हो जाते, जब कोहराम मचाती है,सर्दी॥           #गोपाल कौशल परिचय : गोपाल ...

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पिया मिलन

पिया मिलन को आतुर नैनों, सृष्टि के कण-कण को देखो। प्राण प्रिय 'वो' पिया दिखेंगे, जरा ठहर धड़कन को देखो। सर-सर बहती हवा सुहानी, केवल गाती उसकी कहानी। कान लगाकर सुनो गौर से, हवा के मन, कम्पन को देखो। पिया मिलन को आतुर नैनों, सृष्टि के कण-कण को देखो॥ मंथर-मंथर सरिता का जल, सच होता है सृष्टि का कल। जल के भीतर ...

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बसंत आ गया 

बैचेन निगाहें तुम्हें ढूंढ रही है, कब आओगे कान्हा ! ये पूछ रही है चढ़ ऊँची अटारी, राह निहारी तुम्हारी आ गया बसंत.. अब बारी है तुम्हारी, मिन्नतें कर-कर मैं तो हारी तुमसे, शरण ले लो अपनी बांके बिहारी मैं तो जनम-जनम की प्यासी दासी तुम्हारी, आ गया बसंत भी अब, बारी तुम्हारी छटा छा गई बसंती, पीले फूल खिले क्यारी-क्यारी... आ भी जाओ की ...

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  • लेखक दीर्घा matrubhasha
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