परिचर्चा- बच्चों के नैतिक विकास में परिवार की भूमिका

परिचर्चा संयोजक-
भावना शर्मा, दिल्ली

बच्चों का बचपन और उनका समेकित विकास केवल शिक्षा ही नहीं अपितु पारिवारिक दायित्वों, रिश्तें–नातेदारों, माता-पिता, दोस्त इत्यादि से परिपूर्ण होता है। नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत भाषा, व्यक्तित्व इत्यादि शिक्षण तो विद्यालयों में करवाया जा रहा है किन्तु बच्चों के नैतिक विकास में परिवारों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।

इस कड़ी में मातृभाषा डॉट कॉम द्वारा बच्चों के नैतिक विकास में परिवार की भूमिका विषय पर आयोजित परिचर्चा में विद्वतजनों ने अपने विचार रखे।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली में मौसम विज्ञानी व बाल साहित्यकार सुषमा सिंह जी के अनुसार, ‘बच्चे का परिवार उसकी प्रथम पाठशाला होता है। हम अपने जीवन में हर क्षण कुछ न कुछ सीखते हैं। परिवार का आचार-विचार, रहन-सहन, अपने से बड़ों का सम्मान, दूसरों के प्रति व्यवहार घर के परिवेश से ही बच्चों में आता है और वे उसी तरह ढलते चले जाते हैं।
बालक को अपने बाल्यकाल में जो वातावरण मिलता है, वह उसके भविष्य की नींव होता है। बालक को सर्वप्रथम नैतिक शिक्षा अपने घर से ही मिलती है। परिवार में रह कर वह अनुशासित बनता है और ख़ास तौर पर अपने माता–पिता को देख कर ही वह सीखता है।
एकल परिवार में रहने वाले बच्चे के मुक़ाबले संयुक्त परिवार में बच्चा तेज़ी से विकास करता है। वह बचपन से ही अपने माता–पिता के साथ-साथ दादा, दादी, चाचा, चाची, भाई-बहन आदि सभी का प्यार पाता है।
वह खेल–खेल में जाने–अनजाने कब सबके साथ बहुत सारी बातें सीख जाता है, पता भी नहीं चलता।
उदाहरण के तौर पर वह घर में बड़े लोगों का आदर करना, अपनी चीज़ों को शेयर करना, दु:ख–सुख बांटना, परोपकार, सेवा आदि घर के लोगों को देख कर ही सीख जाता है, उसे बहुत अधिक बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती। परिवार में अगर वह कुछ ग़लत करता है तो उसे टोक भी दिया जाता है। प्यार से या डांट से उसकी ग़लती को सुधारा जाता है। उसे जता दिया जाता है कि क्या ग़लत है और क्या सही।
परिवार के बीच बच्चे ख़ुद को सुरक्षित घेरे में महसूस करते हैं। समाज में हमें किस तरह का व्यवहार करना है यह शिक्षा बच्चे को परिवार से ही मिलती है। बच्चों में बहुत सारी बातों का विकास भी परिवार में ही होता है। कठिन परिस्थितियों में किस तरह से व्यवहार करना है, कैसे मिल जुल कर रहना है, यह सब बच्चे परिवार से ही सीखते हैं।
बच्चे में सहयोग, कर्त्तव्य पालन, जीवन मूल्य की भावना और चरित्र का निर्माण भी घर के वातावरण में होता है। घर का वातावरण जैसा होगा बच्चे के कोमल हृदय और दिमाग़ पर वही सब छप जाएगा। उसके लिए वही सब सही होगा जो वह अपने परिवार में अपने माता-पिता को करते देखेगा। बच्चा भी कब उसी हिसाब से ढल जाएगा, पता भी नहीं चलेगा। यहीं से उसके आने वाले समय में वह कैसा इंसान बनेगा, ये निश्चित हो जाएगा।
बचपन में विकसित हुए गुण और नैतिक मूल्य उसका भविष्य तय करेंगे।
इस तरह से यह कहा जा सकता है कि बच्चों के नैतिक विकास में परिवार की बहुत महत्त्वपूर्ण व अहम भूमिका होती है।’

आकाशवाणी , नई दिल्ली की हिन्दी उद्घोषक व कथाकार अलका सिन्हा जी का कहना है कि ‘नैतिकता कोई शरबत तो है नहीं कि जिसे पानी में घोलकर बच्चों को पिला दिया जाए। न ही यह दो का पहाड़ा है कि जिसे बार-बार बुलवाकर रटवा दिया जाए। यह मुगली घुट्टी भी नहीं कि जिसे चटा-चटाकर जीभ पर चढ़ा दिया जाए। नैतिकता व्यवहार का गुण है, चरित्र की विशेषता है जिसे पढ़ने-लिखने, सुनने-बोलने से ज़्यादा व्यवहार में लाकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। आपने वह कहानी तो सुनी ही होगी कि गुरु जब तक स्वयं अपने क्रोध पर काबू नहीं पा लेते, तब तक वे अपने शिष्यों को संयम का उपदेश नहीं देते। दरअसल, आँखों से देखा, पढ़ने-सुनने से ज़्यादा असर करता है और अनुभव करके जो सीखा जा सकता है, उसका तो कोई मुक़ाबला ही नहीं।

इसमें परिवार की बहुत अहम भूमिका है। बशर्ते, परिवार में साथ होने का, साझेपन का व्यवहार बना हो। वरना आजकल की न्यूक्लियर फ़ैमिलीज़ में जहाँ दोनों पैरेंट्स वर्किंग होते हैं, वहाँ पति-पत्नी साथ तो रहते हैं मगर दो अलग इकाइयों की तरह। संयुक्त परिवारों में जहाँ दिन की शुरुआत बड़ों के चरण-स्पर्श और आशीष वर्षा से होती थी, वहाँ नैतिकता बच्चों का स्वाभाविक गुण हुआ करता था। एक-दूसरे के प्रति दायित्व का बोध, ज़िम्मेदारी का अहसास बचपन से ही चरित्र को गढ़ता था, उसमें नैतिक अहसास भरता था। आज न वैसे परिवार हैं न वैसे बच्चे। अगर आज के बच्चों में श्रवण कुमार का चरित्र खोजना है तो परिवार की आत्मी‌यता को भी पुनर्जीवित करना होगा।’

सर्वोदय कन्या विद्यालय, नई दिल्ली की उप प्राचार्या श्रीमती वन्दना शर्मा जी के अनुसार, ‘अभिमन्यु की शौर्य गाथा से हम चिर परिचित हैं कि कैसे एक छोटे से बालक ने अपने रण कौशल से दिग्गजों से अपना लोहा मनवा लिया। आज की परिचर्चा को यहाँ से शुरू करने का आशय यही है कि बच्चा जब गर्भाशय में होता है, तभी से सीखने लगता है और यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है।

“समाज द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार चलना ही नैतिकता माना जाता है।”
मेरा मानना है कि नियमों को एक छोटे बच्चे को कोई पाठ की तरह न सिखा कर अगर परिवार अपने व्यवहार में लाएगा तो धीरे-धीरे वह बच्चों के व्यक्तित्व के अंग बन जाते हैं। मात्र उपदेश देकर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं की जा सकती।
जैसे:–

  • बड़ों का आदर
  • छोटों से प्यार
  • दूसरों के प्रति सहानुभूति और सहिष्णुता
  • उचित कार्य करना और उसमें संतोष प्राप्त करना
  • परोपकार की भावना
  • समय का सदुपयोग
    आदि–आदि।

नैतिकता कोई विवश करने की वस्तु नहीं है अपितु अनुशासन है। अगर आप जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासित हैं तो स्वमेव ही नैतिक हो जाएँगे।

जैसे जैसे बच्चा बड़े होने लगता है और उसका समाज बढ़ने लगता है…..वह स्कूल के नियम, खेल के मैदान के नियम आदि सीखने लगता है और यहीं पर परिवार की भूमिका और बढ़ जाती है।
नैतिक और अनैतिक बातों का विश्लेषण करके बच्चों को इसका अंतर बताया जाना चाहिए, क्योंकि बच्चे का शारीरिक विकास जितना आवश्यक है, उतना ही नैतिक विकास भी।
जैसे माली पौधे को लगाता है, उसे पानी, खाद आदि देता है। उसकी देखभाल करता है तथा बढ़ने के लिए उचित वातावरण भी देता है, वैसे ही परिवार को एक बच्चे के सर्वांगीण विकास(नैतिक विकास समेत) के लिए उचित वातावरण देना होगा क्योंकि सबसे ज़्यादा वह उसी का अनुसरण करता है और परिणामस्वरूप पूरे समाज को उन्नत बनाता है।’

समय–समय पर मातृभाषा डॉट कॉम इस तरह के विभिन्न विषयों पर परिचर्चा एवं विमर्श सहित विचार आमंत्रित कर बौद्धिक समृद्धता के लिए प्रयत्नशील रहेगा।

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