Archives for काव्यभाषा

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सतयुग से कलयुग

सतयुग से कलयुग है आया,क्यों दशा न बदली युग बीते , नारी  सदियों से  है  अबला , वेदों  के कथन  सभी  रीते। देवी  तो मात्र  दिखावा है , झुकता जग…
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फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो

मुझे भुला दिया तो रात भर जागते क्यूँ हो मेरे सपनों में दबे फिर पाँव भागते क्यूँ हो एक जो कीमती चीज़ थी वो भी खो दी अब बेवजह इस…
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खुशी हो या गम नशा का सेवन क्यों 

पर्व-त्योहारों या गम को दूर करने के लिए अथवा विभिन्न सामाजिक पार्टीयों में विशेषकर फब पार्टीयों में नशीली पदार्थो जैसे शराब सिगरेट आदि का प्रचलन बढ़ रहा है और इसे…
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आओ ! बनाएं शांति धाम

आओ! दुनियावालों कुछ हम भी आज बच्चों से सीख लें। मिठास मुस्कान से विभोर कर दें हर शत्रु को, बंदूक उठाने की बजाए फूल हाथों में लेकर स्वागत की जयमाला…
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वक्त

 nir मौत  ने  भी  अपने  रास्ते बदल डाले, मैं जिधर चला उसने कदम वहाँ डाले। जब - जब लगा मेरे जख्म भरने लगे, पुराने वक्त की यादों ने फिर खुरच…
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सृजन !

पुलकित कंपित चातक गाये ! गुंजित बादल विपुला छाये !! उमड़ घुमड़ कर अंबर घेरा ! श्यामल गर्वित रूप घनेरा ! अम्बुद घोर हुआ अंधेरा ! दमक दामिनी डाला डेरा…
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