अच्छी नहीं लगतीं

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बे-बजह की ये फब्तियां अच्छी नहीं लगतीं,
दर्द भरी ये सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं।
जरूरत पर ही याद करते हैं जो खुदा को,
लोगों की ये खुदगर्जियाँ अच्छी नहीं लगतीं।
जाति-धर्म के नाम जो जला देते हैं मकां,
उजड़ी हुई ये बस्तियां अच्छी नहीं लगती।
नसीब कैसे होगी सुंदर बहू उनको जिन्हें,
घर में नन्हीं बच्चियां अच्छी नहीं लगतीं।
दिल मात-पिता का दुखाया न बात मानी,
बच्चों की ये मनमर्जियां अच्छी नहीं लगतीं।
अपनों से ही हर वक्त जो करते रहे धोखे,
लोगों की ये अय्यारियाँ अच्छी नहीं लगतीं।
डर लगता है तूफानों का चलने से जिन्हें,
ठहरी हुई ये कश्तियाँ अच्छी नहीं लगतीं।
काम औरों के कभी जो न आया ‘संतोष’
उनके घर नाम की तख्तियां अच्छी नहीं लगतीं॥

           #सन्तोष कुमार नेमा ‘संतोष’

परिचय : लेखन के क्षेत्र में सन्तोष कुमार नेमा ‘संतोष’ जबलपुर से ताल्लुक रखते हैं। आपका जन्म मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के आदेगांव ग्राम में 1961 में हुआ है। आपके पिता देवीचरण नेमा(स्व.) ने माता जी पर कई भजन लिखें हैं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है।1982 से डाक विभाग में सेवारत होकर आप प्रांतीय स्तर की ‘यूनियन वार्ता’ बुलेटिन का लगातार संपादन कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी प्रांतीय सचिव चुने जाने पर छत्तीसगढ़ पोस्ट का भी संपादन लगातार किया है। राष्ट्रीय स्तर पर लगातार पदों पर आसीन रहे हैं।आपकी रचनाएँ स्थानीय समाचार पत्रों में प्रमुखता से छपती रही हैं। वर्त्तमान में पत्रिका के एक्सपोज कालम में लगातार प्रकाशन जारी है।आपको गुंजन कला सदन (जबलपुर) द्वारा काव्य प्रकाश अलंकरण से सम्मान्नित किया जा चुका है। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में भी आप सक्रिय हैं।आपको कविताएं,व्यंग्य तथा ग़ज़ल आदि लिखने में काफी रुचि है। आप ब्लॉग भी लिखते हैं। शीघ्र ही आपका पहला काब्य संग्रह प्रकाशित होने जा रहा है।

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