एक बार सभी सत्ता पक्ष के राजनेताओं का मत हुआ कि चलो भ्रष्टाचार मापक यन्त्र मंगवाया जाय।
जापान में बना यन्त्र अधिमूल्य देकर भारत लाया गया।जैसे ही बड़े नेता जी ने अपना लेवल चेक करने के लिये बटन दबाया पारा ऊपर चढ़ गया और अजीब-सी कम्पन होने लगी।सभी नेतागण भयभीत थे उन्होंने जापान फ़ोन लगाया और सारा हाल सुनाया।यन्त्र जापान में बना जरूर था पर अभियंता भारतीय था।आरक्षण से हारकर विदेशी होना पड़ा था परन्तु जनता था कि देश को उसकी आवश्यकता है।उसे जापानियों ने फ़ोन लगाया और हैल्लो बोलने से पहले उस अभियंता का उत्तर आ गया।”अब कुछ नहीं हो सकता पारा गर्म है अब जो होगा होम-हवन से ही ठीक होगा”।फोन कट गया।आधी रात को नेताओं की मीटिंग बुलाई गई तभी कुछ दूसरी पार्टी के लोग विरोध करने लगे।अब मार्गदर्शक मंडल वाले पूज्य गुरुदेव ने रुंधे गले को साफ करते हुए बताया कि भगवान के क्रोध से ही ऐसा हुआ है इसलिए यथाशीघ्र बचाव कार्य (यानी कि यज्ञ) सम्पन्न होना चाहिये।अब गुरुजी स्वयं बोले तो बात तो मानी जायेगी ही परन्तु पार्टी में कुछ लेखक,विचारक,कवि भी थे और वो अब भी असन्तुष्ट थे।उन सज्जनों का मत ये था कि यदि कमान उनके हाथों में दे दी जाए तो बिना होम-हवन पारा शांत हो सकता है।समय वाद-विवाद में निकल गया और शास्त्रों का ज्ञान धरा ही रह गया।
सबसे ऊपर वाले नेता जी अत्यधिक भयभीत थे तो उन्होंने सारी यज्ञ की तैयारी कर ली थी।असेम्बली के नीचे से बिल पास हो गया नेता जी के बंगले में कल हवन होना था अब।किसी तरह राम-मरा-राम-मरा करते-करते नेता जी रात गुजरी।अब भोर हो चुकी थी नेता जी पारा देखने पहुँचे कोई अंतर नहीं था परन्तु उनके भय का पारा चरम सीमा पर पहुँच गया था।अब यज्ञ की सम्पूर्ण तैयारी हो चुकी थी और दरकार थी तो केवल एक ब्राह्मण देव की।हमने सोचा क्यों न हम ही यज्ञ सम्पन्न करा दें,जाति के ब्राह्मण हैं ही जन्म के बाद और अब इस खेल के साक्षी भी बन जाएँगे परन्तु हम अपने घर का पारा देख आये और हमारे सर से ये भूत उतर गया।इधर नेता जी ब्राह्मण देव खोज लाये थे उनके गले में जाति-प्रमाणपत्र लटका पड़ा था जोकि सब कहानी कह रहा था।अब ब्राह्मण देव ने थाल, पुष्प,जल,अक्षत,पंचामृत चौकोर इत्यादि जुगाड़ कर रख लिया।नेता जी ब्राह्मण देव पर भीतर-ही-भीतर खिन्न थे परन्तु चेहरा देख मुस्कुरा रहे थे।अब धर्म और वेद के ज्ञाता ब्राह्मण देव ये सब समझ रहे थे उन्होंने अपनी गति बढ़ाई और कलश स्थापना पूर्ण की।
अब आगे बढ़ते हुए उन्होंने हवन के लिए अग्नि मंगवाई,नेता जी सब तैयारी कर चुके थे उन्होंने अब देखा न ताव चन्दन,बरगद,आम,बेल इत्यादि के लकड़ी को हवन कुंड में डाल कर पूरी घी की डिबिया ऊपर से उड़ेल दी।अब ज्योहीं पण्डित जी ने कपूर रख आग जलाई उनके धोती का कोना जल उठा,उन्होंने आनन-फानन में कलश का जल उड़ेल कर आग बुझाई और पहला मन्त्र पढ़ा।
नेता जी ने आहुति डाली ही थी की भगवन प्रकट हो गए।अब नेता जी और भयभीत हो गए तभी भगवन कहा ये पारा मेरे क्रोध से नहीं जनता के क्रोध से उफान पर है।छोटे नेता जी को अब तनिक आराम मिला परन्तु बड़े नेता जी बड़े चालाक थे उन्होंने धीरे से कहा इसका कोई हल भगवन!
तभी भगवन ने कहा मैं आज से तुम्हें एक नई शक्ति देता हूँ!
तुम कुछ भी कहोगे और ये आमजन
आपस में लड़ पड़ेंगे कुछ तुम्हें भला कहेंगे कुछ बुरा पर अंततः ये लड़ाई इस पारा को शांति देगी और तुम आराम से शासन करोगे।
तथास्तु!(अंतर्धान)
परिचय-
नाम-अलोक कुमार
साहित्यिक उपनाम-अलोक कुमार वशिष्ठ
वर्तमान पता-पकरीबरावां (एरुरी)
राज्य-बिहार
शहर-नवादा
शिक्षा-जारी 12वीं कक्षा में अध्ययनरत
विधा -आलेख/कविता
लेखन का उद्देश्य-सामाजिक बदलाव