विश्व के लिए बुद्ध ही समाधान हैं

बुद्ध जयंती विशेष

● प्रो. सुरेंद्र दुबे

आज दुनिया बारूद की ढेर पर बैठी है। चारों ओर विध्वंस और विप्लव की ज्वाला धधक रही है। जहाँ शांति दिख रही है, वहाँ भी भीतर-भीतर एक चिंगारी महसूस की जा सकती है। बड़े-बड़े देशों के कर्णधार ऊपर-ऊपर से शांति पाठ करते दिखते तो हैं परन्तु अन्दर-अन्दर वे भी ‘सिकंदर’ बनने का सपना पाल बैठे हैं। वन-वनस्पतियाँ, पहाड़-पठार, झील-झरने, नदी-नाले, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी – सब सहमे हुए से धरती के विध्वंसमय भविष्य को देख रहे हैं और मनुष्य है कि प्रकृति के नैसर्गिक स्वरूप को तीव्र गति से क्षरित करता जा रहा है। ऐसी स्थिति में भारत एक विकल्प है- भारतीय दर्शन और चिन्तन दुनिया को रास्ता दिखा सकते हैं।
हमारे प्रधान मंत्री जी बार-बार कहते हैं कि दुनिया ने युद्ध दिया तो हमने ‘बुद्ध’ दिया है। आखिर बुद्ध में ऐसा क्या है कि बार-बार हमें बुद्ध के पास जाने की जरूरत महसूस हो रही है। आज से लगभग 2600 वर्ष पहले भारत की धरती पर एक महामानव ने जन्म लिया था, जिसने तत्कालीन जलती हुए धरती को शीतलता प्रदान की थी और आज भी उसके उपदेश दुनिया को ईर्ष्या, स्वार्थ और संघर्ष के ताप से मुक्ति दिला सकते हैं। ईसा पूर्व छठीं शताब्दी में लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में कपिलवस्तु की रानी महामाया देवी ने यात्रा के दौरान एक शिशु को जन्म दिया। राजा शुद्धोदन की संतान के रूप में सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु में 29 वर्ष बिताये। एक सुन्दर कन्या- यशोधरा से उनका विवाह हुआ और इनके ‘राहुल’ नामक एक संतान का जन्म हुआ। सिद्धार्थ की चेतना ऊर्ध्वमुखी थी। कपिलवस्तु का राज, पत्नी यशोधरा का सौन्दर्य और राहुल का बालसुलभ आकर्षण भी उन्हें बाँध नहीं सका और वे एक दिन जगत की ज्वाला शांत करने के लिए ‘महाभिनिष्क्रमण’ कर गए। उन्होंने लगभग 6 वर्ष तप किया। उन्हें गया में निरंजना नदी के तर पर एक वटवृक्ष (बोधिवृक्ष) के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह ज्ञान ही ‘बुद्धत्व’ (जाग्रत) है और यहीं से वे ‘बुद्ध’ कहलाये। बुद्ध ने मनुष्य मात्र के बीच समरसता, सत्य, न्याय और शांति का उपदेश देते हुए 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। बुद्ध का अपने प्रिय शिष्य आनन्द को दिया गया अंतिम उपदेश था- ‘अत्त दीपो भव’ (अपना दीप-प्रकाश स्तम्भ स्वयं बनो) उनके उपदेश त्रिपिटक (सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक) में संकलित किये गए हैं।
बुद्ध ने कहा कि संसार दुःखमय है। दुःख का कारण है। दुःख का निरोध संभव है। दुःख से मुक्ति का मार्ग है। इसे ही आर्य सत्य कहा जाता है। अर्थात इस दुःखमय संसार के दुःख का कारण ‘तृष्णा’ (दुख समुदाय) है। ये तृष्णा-इच्छाएँ अनन्त हैं। इनके त्याग से ही दुःख निरोध – दुःख से मुक्ति संभव है। उन्होंने चौथे आर्य सत्य के रूप में दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा – दुःख से मुक्ति का मार्ग – ‘अष्टांगिक मार्ग’ बताया है। वे मध्यम मार्ग (मजिभ्म निकाय) पर बल देते हैं। उनका कहना है कि सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक (वाणी), सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम (प्रयास), सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि ही वे मार्ग हैं जिस पर चलकर मनुष्य संसार को दुःख से मुक्त कर सकता है। क्या यह इतना आसान है? कठिन जरूर है पर असंभव नहीं। मनुष्य अगर अपनी तृष्णा (इच्छाओं) का त्याग कर मध्यम मार्ग पर चले तो अवश्य वह स्वयं दुःखों से मुक्त हो सकता है और संसार को भी दुःखरहित कर सकता है। बुद्ध जिसे पंचशील कहते हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, नशा और व्यभिचार से मुक्ति, की नैतिक जीवन प्रणाली को स्वीकार कर हम निर्मल हो सकते हैं। निर्मल मनुष्य जिस दिन अष्टांगिक मार्ग पर चलते हुए अपनी जीवन यात्रा प्रारम्भ कर देगा उसी दिन से संसार से दुःखों का निरसन प्रारंभ हो जाएगा।
गौतम बुद्ध की गाथाओं का एक पवित्र संग्रह है- ‘धम्म पद’, जिसे बौद्धों की गीता कहा जाता है। इस ग्रंथ में 26 वर्गों (वग्गो) में 423 गाथाएँ संकलित हैं। भगवान बुद्ध के विचारों को इन गाथाओं में सूत्र रूप में पिरोया गया है। यहाँ चंचल चित्त को संयत करने से लेकर पाप से मुक्ति और सदाचरण द्वारा मनुष्य की वृत्ति के नियंत्रण का पाठ है। त्रिपिटक, जातक और धम्म पद की शिक्षाओं द्वारा बुद्ध ने मनुष्य को नैतिक जीवन जीने का मार्ग बताया है। स्वार्थ की संकुचित सीमा से निकलकर परमार्थ के अनन्त विस्तार को पाना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए।
आज अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध, रूस-यूक्रेन युद्ध, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया या चीन-ताइवान के मध्य चल रहा विवाद- ये सभी घटनाएँ विश्वशांति के लिए गंभीर खतरा हैं। इतना ही नहीं पंथिक उन्माद या आतंकी घटनाएँ भी मनुष्यता के समक्ष संकट बन कर खड़ी हैं। वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे उलट-फेर भी युद्ध की विभीषिका को आमंत्रित करते दिखाई देते हैं। विश्व में चल रहे सभ्यता-संघर्ष, नस्लीय तनाव या आर्थिक वर्चस्व के लिए युद्धोन्माद की घटनाएँ एक ऐसी विषबेल बन चुकी हैं, जिसका सार्थक समाधान नहीं दिख रहा है। विश्व का अनागत गंभीर संकट से घिरा दिखाई दे रहा है और इन सबके पीछे है- मनुष्य की तृष्णा। एक ऐसी दुर्निवार प्यास, जो निरंतर मनुष्यता का रक्त पीकर भी बुझ नहीं रही है। करुणा, सहिष्णुता, त्याग और उदारता जैसे भाव लुप्त हो गए हैं। आज दुनिया सब कुछ पा लेने, तत्काल पा लेने और बिना कुछ किये पा लेने की अंधी दौड़ में शामिल है। ऐसी स्थिति में संसार के समक्ष बुद्ध एक समाधान देते हैं। वैर-शत्रुता को मिटाने का उनका स्पष्ट उपदेश है कि “वेरेन वेराणि समंतीध कुदाचनो। अवेरेन वेराणि समंतीध एस धम्मो सन्तनो”। अर्थात् शत्रुता से शत्रुता को कभी नहीं मिटाया जा सकता। प्रेम से शत्रुता को मिटाया जा सकता है। वे संघर्ष के मूल में तृष्णा और क्रोध को मानते हैं, पर इस क्रोध को भी जीता जा सकता है- ‘अकोधेन जिने कोधं’ अर्थात शांति से क्रोध पर विजय पाई जा सकती है। वे सदैव सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं, क्योंकि उनका विश्वास है कि मनुष्य का जितना हित माता-पिता या भाई-बंधु नहीं कर सकते उससे अधिक हित सन्मार्ग पर लगा हुआ चित करता है- ‘सम्मापणि हितं चित्तं’। बुद्ध मनुष्य को परिष्कृत अन्तःकरण, सत्य और करुणा से आप्लावित चित्त और प्रेम का साक्षात् विग्रह बनाना चाहते हैं ताकि युद्धोन्माद का नाश हो, विश्व का कल्याण हो तथा चतुर्दिक मंगल की वर्षा हो और मनुष्य पंचशील का अनुगामी बनकर संसार को दुःख की ज्वाला से मुक्ति दिला सके।

प्रो. सुरेंद्र दुबे

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, पूर्व कुलपति और
संप्रति केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष हैं)

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