अश्रू नयन के मोती हैं,
नाहक नहीं गिरा लेना।
गहन वेदना के मरहम हैं,
काम है मन सहला देना॥
ये पीड़ा के नहीं पक्षधर,
हैं पीड़ित के बेबस हथियार।
निकले नयन से मन मथकर,
आँसू व्यथित हृदय के भार॥
हृदय-घाव पर उठे फफोले,
वाष्पीकरण होकर गिरते।
निकले जहाँ दर्द वही जाने,
जो जन जब सहन करते॥
व्यथा-कथा कह जाते मन की,
अश्क नयन के बन शबनम।
गिरकर गुप्त रहस्य खोलते,
अन्तर प्रदाह पीड़ा घुटन॥
कभी निकल पड़ते हैं आँसू,
हो भक्ति भाव में आत्मविभोर।
अतिशय हर्षोल्लास में आँसू,
उमड़ उठते हैं दृग-कोर॥
आँसू सहज वेदना-बोधक,
युगल नयन में किए मुकाम।
मानव शिला खण्ड बन जाता,
अश्रु न जो देते भगवान॥
उमड़े कई बार भूमि पर,
रक्तिम अश्रु के सैलाब।
उजड़-उजड़ कर बसी,
दुनिया फिर से हुई आबाद॥
#विजयकान्त द्विवेदी
परिचय : विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि चम्पारण (बिहार) है। मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त जी की प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में हुई है। तत्पश्चात स्नातक (बीए)बिहार विश्वविद्यालय से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान विवि से सेवा के दौरान ही किया। भारतीय वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई में आपका स्थाई निवास है। किशोरावस्था से ही कविता रचना में अभिरुचि रही है। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’ दिल्ली से १९८४ में प्रकाशित हुआ है। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव और संप्रति से स्वतंत्र लेखन है।
Thu Dec 14 , 2017
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