आदरांजलि –

फ़ोटोग्राफ़ी क्षेत्र के शुरुआती दिनों में हर उभरता हुआ फ़ोटोग्राफ़र रघु राय की फ़ोटोग्राफ़ी का दीवाना हो जाता है। उनकी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ तस्वीरों में जो नाटकीयता और गहराई होती है, वह किसी को भी मंत्रमुग्ध करने के लिए काफ़ी है।
फ़ोटोग्राफ़ी जब केवल एक तकनीक थी, तब रघु राय ने इसे एक जीवंत विधा और मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज़ बना दिया। रघु राय केवल एक फ़ोटोग्राफ़र नहीं थे; वे स्वतंत्र भारत की उन आँखों के समान थे, जिन्होंने देश के अंतर्विरोधों, इसकी सुंदरता और इसकी त्रासदी को समान गहराई से देखा है। अक्सर उन्हें एक ‘कलात्मक फोटोग्राफ़र’ के रूप में देखा जाता है। [हालाँकि कुछ स्थापित कलात्मक फ़ोटोग्राफ़र उन्हें कलात्मक फ़ोटोग्राफ़ी के रूप में ख़ारिज करते हैं] लेकिन उनके काम की गहराई को और उसमें छुपे दर्शन को समझने पर यह स्पष्ट होता है कि वे एक जनप्रिय फ़ोटोग्राफ़र अधिक थे, जिनका सीधा जुड़ाव आम आदमी के जीवन से था। रघु राय की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनकी तस्वीरों में दिखने वाला ‘सत्य’ है। उनके लिए फ़ोटोग्राफ़ी केवल प्रकाश और छाया का खेल नहीं, बल्कि इतिहास को ठहरकर देखने की एक प्रक्रिया रही है।
भोपाल गैस त्रासदी की वह हृदयविदारक तस्वीर हो या शरणार्थियों के चेहरे पर अंकित पीड़ा, रघु राय ने कभी भी दुख का प्रदर्शन (glamorize) नहीं किया। उन्होंने इसे एक ऐसी ईमानदारी के साथ पेश किया कि वह तस्वीर केवल समाचार नहीं, बल्कि जनमानस की सामूहिक चेतना का हिस्सा बन गई।
बनारस के घाटों से लेकर दिल्ली की गलियों तक, उनकी तस्वीरों में भारत की वह ‘धड़कन’ सुनाई देती है, जिसे आम आदमी रोज़ जीता है। यही कारण है कि उनकी तस्वीरें केवल दीर्घाओं (galleries) तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि लोगों के दिलों में उतर गईं।
रघु राय के संदर्भ में यह कहना बिल्कुल सही है कि उन्हें तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक शक्ति केंद्रों का जो सानिध्य मिला, उसने उन्हें वह ‘विशेषाधिकार’ (Privilege) दिया, जो उनके समकालीनों के लिए दुर्लभ था। सत्ता के गलियारों तक उनकी सीधी पहुँच थी। हालाँकि यह सुविधा या मुकाम हासिल करने के लिए जो मेहनत करना पड़ती, वह किसी को दिखाई नहीं देती। रघु राय का प्रधानमंत्री आवास या महत्त्वपूर्ण राजनेताओं के व्यक्तिगत जीवन तक पहुँचना कोई साधारण बात नहीं थी। उन्होंने इंदिरा गांधी को उनके सबसे शक्तिशाली और सबसे कमज़ोर, दोनों क्षणों में क़ैद किया। यह केवल एक पेशेवर रिश्ता नहीं था, बल्कि एक गहरा विश्वास था। इस विश्वास के कारण ही वे उन जगहों पर कैमरा ले जा सके, जहाँ सुरक्षा और प्रोटोकॉल दूसरों को रोक देते थे। जब आपके पास ‘एक्सक्लूसिव एक्सेस’ होता है, तो आपकी खींची गई तस्वीरें अपने आप ऐतिहासिक दस्तावेज़ बन जाती हैं क्योंकि वैसी तस्वीर लेने का मौका किसी और को मिला ही नहीं।

भिंडरावाले की जो तस्वीरें रघु राय ने खींची हैं, वे केवल फ़ोटो पत्रकारिता नहीं बल्कि ‘इतिहास की गवाह’ हैं। उस दौर के तनावपूर्ण माहौल में स्वर्ण मंदिर के भीतर जाकर भिंडरावाले के इतने क़रीब से चित्र लेना और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को क़ैद करना बिना किसी विशेष पैठ या राजनीतिक साख के संभव नहीं था। यहाँ उनकी ‘प्रिविलेज’ ने उन्हें उस इतिहास को रिकॉर्ड करने का मौका दिया, जिसे दुनिया केवल बाहर से देख रही थी।
मदर टेरेसा के साथ उनकी फ़ोटो शृंखला इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे उन्हें ‘इनर सर्कल’ (Inner Circle) में जगह मिली। मदर टेरेसा अक्सर पब्लिसिटी से दूर रहती थीं, लेकिन रघु राय को उन्होंने न केवल अनुमति दी बल्कि उन्हें अपने काम और प्रार्थना के निजी पलों में भी शामिल होने दिया, यह अटूट विश्वास का रिश्ता ही था, जिसने उन तस्वीरों को इतना मानवीय और दिव्य बनाया। यह एक ऐसा विशेषाधिकार था, जिसे रघु राय ने अपनी साख और अपने संस्थान की ताक़त से हासिल किया था।
बड़े संस्थानों (जैसे ‘इंडिया टुडे’) में होने के कारण उन्हें जो ‘प्रेस क्रेडेंशियल्स’ और सुरक्षा मिली, उसने उनके लिए कई बंद दरवाज़े खोल दिए। तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान यह जानता था कि रघु राय की तस्वीर का मतलब है- देश और दुनिया के सबसे प्रभावशाली मंच पर उपस्थिति। इसलिए, राजनेता और प्रभावशाली व्यक्तित्व ख़ुद भी उन्हें एक्सेस देना पसंद करते थे। उनके समकालीन शायद तकनीकी रूप से उतने ही सक्षम रहे हों, लेकिन इस ‘नेटवर्किंग’ और ‘एक्सेस’ की कमी ने उन्हें वह वैश्विक पहचान नहीं दिलाई, जो रघु राय को मिली। किन्तु रघु राय की महानता इस बात में थी कि उन्होंने इस ‘विशेषाधिकार’ का उपयोग केवल सत्ता की चाटुकारिता के लिए नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और ऐतिहासिक सच्चाइयों को दर्ज करने के लिए किया। उन्होंने सत्ता का सानिध्य पाया, लेकिन उस सानिध्य का इस्तेमाल आम आदमी (जनमानस) तक उन अनकही कहानियों को पहुँचाने के लिए किया जो सत्ता की चकाचौंध में अक्सर छिप जाती हैं।
यही कारण है कि वे केवल एक ‘दरबारी फ़ोटोग्राफ़र’ बनकर नहीं रह गए, बल्कि एक दार्शनिक चित्रकार के रूप में उभरे।
लेकिन, रघु राय को पूरी तरह से समझना तब शुरू होता है, जब आप उन्हें सुनते थे । उनकी शख्सियत का एक जादुई पहलू उनके बोलने का अंदाज़ और उनके जीवन के दृष्टांत था । एक समय आता है ल, जब उनकी तस्वीरें पीछे छूट जाती हैं और व्यक्ति उनके विचारों का कायल हो जाता है। रघु राय जब बात करते थे, तो वे केवल एक ‘शटर’ दबाने की तकनीक नहीं सिखाते थे, बल्कि वह ‘देखने की दृष्टि’ प्रदान करते थे। उनका संवाद फ़ोटोग्राफ़ी के दायरे को पार कर जाता था। वे अक्सर कहते थे कि फ़ोटोग्राफ़र को वहाँ मौजूद होना चाहिए, लेकिन इस तरह कि उसकी उपस्थिति महसूस न हो या देनेवाला तुम्हें बाहें फैला कर देना चाहता है और तुम सिर्फ़ अंजुरी भर कर ख़ुश हो जाते हो, ऐसे विचार सीधे तौर पर भारतीय दर्शन के ‘साक्षी भाव’ से जुड़ता थे। उनके बोलने में भारतीय दर्शन की वह सुगंध थी, जो हमें जड़ों की ओर ले जाती है। चाहे वे संगीत के उस्तादों (पंडित रविशंकर या एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी) के साथ बिताए क्षणों के बारे में बताए या जीवन की नश्वरता पर बात करें, उनका दृष्टिकोण हमेशा आध्यात्मिक और गहरा होता था। वे जिस सादगी और अधिकार के साथ विषयों को समझाते थे, वह अद्भुत था। उनके लिए तस्वीर लेना ‘इंतजार’ की एक साधना है, और यही धैर्य उनके विचारों में भी झलकता है।
रघु राय का योगदान केवल इस बात में नहीं था कि उन्होंने भारत को कैसा ‘दिखाया’, बल्कि इसमें है कि उन्होंने हमें अपनी विरासत और अपने समय को ‘महसूस’ करना सिखाया। उनकी तस्वीरों के दीवाने तो लाखों हैं, लेकिन उनके विचारों, उनके बोलने के ढंग और उनके जीवन दर्शन को समझने वाले जानते हैं कि रघु राय एक ऐसे सृजक थे जो कैमरे और कलम, दोनों से परे जाकर सीधे आत्मा से संवाद करते थे ।
वे एक ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने कला को जनमानस के चरणों में समर्पित कर दिया, और शायद इसीलिए वे आज भारत के सबसे प्रिय और प्रतिष्ठित फ़ोटो पत्रकार हैं या थे…..
दिलीप लोकरे
पूर्व फ़ोटो एडिटर- फ़्री प्रेस, इंदौर


