यह कैसा मातृभाषा दिवस है ?

vaidik

आज सारी दुनिया के देश मातृभाषा दिवस मना रहे हैं। 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस क्यों मनाया जाता है ? क्योंकि यूनेस्को ने इसे 1999 में मान्यता दी थी। 21 फरवरी को इसलिए मान्यता दी गई क्योंकि इसी दिन 1952 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के नौजवानों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए थे। पाकिस्तान इन पर उर्दू थोप रहा था और वे बांग्ला चाहते थे। उर्दू तो पाकिस्तान की भी भाषा नहीं है। वह तो भारत से गए मुहाजिरों की भाषा है। पाकिस्तान की भाषाएं हैं— पंजाबी, सिंधी, पश्तो और बलूच आदि। वास्तव में मातृभाषा के इस आंदोलन ने 1971 में बांग्लादेश को अलग राष्ट्र के रुप में स्थापित किया। अब बांग्लादेश के साथ दुनिया के सभी देश 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रुप में मनाते तो है लेकिन सारी दुनिया में आजकल मातृभाषाओं या राष्ट्रभाषाओं की स्थिति क्या है ? आप पांच महाशक्तियों, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया,  न्यूजीलैंड तथा यूरोपीय राष्ट्रों जैसे देशों को छोड़ दें तो आज भी दुनिया के ज्यादातर देश भाषाई गुलामी का बोझ ढो रहे हैं।

एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका के देशों में अंग्रेजी, फ्रांसीसी, हिस्पानी आदि औपनिवेशिक भाषाओं का वर्चस्व बना हुआ है। जो देश पहले गुलाम रहे हैं, वे आज भी सांस्कृतिक दृष्टि से गुलाम है। उनके कानून, उनकी ऊंची शिक्षा, उनका न्याय, उनका प्रशासन अभी भी उनके पुराने मालिकों की भाषा में चलता है। वहां मातृभाषा अब भी नौकरानी है और मालिकों की भाषा महारानी है। भारत में इस गुलामी को महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और राममनोहर लोहिया ने चुनौती दी थी। हमारे वर्तमान नादान नेताओं को क्या कहें, वे मातृभाषाओं की रक्षा कैसे करेंगे, जब राष्ट्रभाषा ही भारत में पददलित हो रही है। दुनिया में अभी लगभग 7000 भाषाएं या बोलियां हैं। उनकी रक्षा नहीं होगी तो उनके साथ जुड़ी परंपराएं, मूलवृत्तियां, मूल्यमान और चिंतन पद्धतियों का भी लोप होता चला जाएगा।

#डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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उम्मीद

Fri Mar 9 , 2018
आँखे थकती है फिर भी जगती है एक उम्मीद ही मेरे साथ संघर्ष करती है दुनिया केवल हर्ष में हिस्सा मांगती है उम्मीद ही केवल संघर्ष मे साथ निभाती है आंसू भी मुस्कान बनते जब उम्मीद साथ रहती है रुके कदम बढ़ जाते जब उम्मीद की धारा बहती है तानो […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।