जिसे खून लगा मुंह सत्ता का,
उसे न भान है जनता का।
देखी कायरता उन कुत्तों की,
जो घात लगाए बैठे थे।
सोच `सिंह` का वध करने का,
अरमान दिल में जगा बैठे थे।
चन्द सियासी जयचंदों ने,
वीर सपूत को झोंक दिया।
झुलस उठी माँ भारती,
देख लहू उन लालों का।
धधक उठा ज्वार अचानक,
सर्जिकल-सा संग्राम हुआ।
घर में घुसकर काफिरों के,
भीषण नरसंहार हुआ।
दिया घात पर आघात दूसरा,
नकली धन बर्बाद हुआll
#प्रमोद बाफना
परिचय : प्रमोद कुमार बाफना दुधालिया(झालावाड़ ,राजस्थान) में रहते हैं।आपकी रुचि कविता लेखन में है। वर्तमान में श्री महावीर जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय(बड़ौद) में हिन्दी अध्यापन का कार्य करते हैं। हाल ही में आपने कविता लेखन प्रारंभ किया है।
Sat Oct 14 , 2017
निर्जन नाम साथ हरे-भरे खेत-खलिहान, और कुछ आढ़ी-टेढ़ी बस्तियों-सा गाँवl कुछ अकेले और मन संचित ह्रदय वाले, आशा के रहीम,फकीर ह्रदय का मूर्छावl कर्ज में पीढ़ी-पीढ़ी और आत्मज अर्पण, बँटता रहता,रीढ़ की हड्डी-सा बचा-कुचाl मन उज्ज्वल मन्दिर,आशा उसकी माया, काया को न नसीब ह्रदय आशा का सच्चाl मन तिनकों से […]