कलुष-कलि-कलश पर,
गीता यष्टी प्रहारक है।
कर्म ज्ञान और भक्ति,
यह सबका विचारक है॥
सुरभि श्री कृष्णारविन्द की,
अर्जुन -अलि का प्यारा ।
जगत की पापनाशिनी,
परम सुरसरि की है धारा॥
#विजयकान्त द्विवेदी
परिचय : विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि चम्पारण (बिहार) है। मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त जी की प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में हुई है। तत्पश्चात स्नातक (बीए)बिहार विश्वविद्यालय से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान विवि से सेवा के दौरान ही किया। भारतीय वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई में आपका स्थाई निवास है। किशोरावस्था से ही कविता रचना में अभिरुचि रही है। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’ दिल्ली से १९८४ में प्रकाशित हुआ है। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव और संप्रति से स्वतंत्र लेखन है।
Thu Jul 27 , 2017
आज फिर एक खिलती कली पाई कचरे के ढेर पर, चीत्कार कर उठा ह्दय तड़प उठी ममता भी। रक्त उबल आया आंखों में, उस बेदर्द ह्दयहीन जननी पर हजारों सवाल खड़े हो गए उस मासूम की आंखों में। जब तुम्हें नहीं थी मेरी अभिलाषा, क्यों तुम मुझ को लाई जग […]