भारत बंदः नेताओं की करतूतें

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भारत बंदः नेताओं की करतूतें

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है, मातृभाषा.कॉम का नहीं।

विरोधी दलों द्वारा घोषित भारत-बंद को विफल तो होना ही था। इसके कई कारण हैं। एक तो आम आदमी आज भी यह मानता है कि मोदी ने यह नोटबंदी देश के भले के लिए की है। वह परेशानियों से काफी नाराज है लेकिन फिर भी वह उसे बर्दाश्त कर रहा है। दूसरा, लोग बैंक की कतारों में लगे या भारत बंद में शामिल हों? शनिवार-इतिवार को बैंकों की छुट्टी थी। सोमवार को उन पर भीड़ लगनी ही थी। विरोधी नेताओं को इसका अंदाज नहीं रहा होगा। दिल्ली में विरोधियों की सरकार है लेकिन दिल्ली में बंद का कोई असर नहीं दिखा। तीसरा, दुकानदारों और मजदूरों के लिए यह बंद ‘गरीबी में आटा गीला’ जैसी स्थिति पैदा कर रहा था। बंद करेंगे तो खाएंगे क्या? चौथा, विरोधी दलों में ही बंद को लेकर एका नहीं था। विभ्रम था। जिन नेताओं का अपने इलाके में कुछ असर है, वहां भी बंद नहीं हुआ पर प्रदर्शन जरुर हुए लेकिन ऐसे प्रदर्शन तो वे किसी भी बहाने से करवा सकते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार मौज करने लगे। जैसे उसने एक नकली जन-सर्वेक्षण करवा कर नोटबंदी को ठीक सिद्ध करने की कोशिश की। उसकी मजाक बन गई। बदहवास होने पर सरकारें इसी तरह की हरकतें करती हैं लेकिन संतोष की बात यही है कि यह सरकार बदहवास होने के बावजूद होशो-हवास में है। इस सरकार में कुछ ऐसे मंत्री हैं, जो अपने आप को सर्वज्ञ नहीं समझते और उनमें जरुरी लचीलापन भी है। वे ऊपर से टपके हुए नेता नहीं हैं। वे जनता से जुड़े हुए लोग हैं। वे रोज-रोज रचनात्मक सुझाव दे रहे हैं ताकि कीचड़ में फंसा हाथी किसी तरह बाहर निकल सके।

आज संसद में आया, नया आयकर संशोधन विधेयक इसी तरह की एक पहल है। इस तरह की पहल करने की बात मैंने तीन दिन पहले दोहराई थी। उसे मैंने 8-9 नवंबर को भी सुझाया था। इस पहल के बावजूद काला धन खत्म होने वाला नहीं है। यह सिर्फ अल्पकालिक राहत है। यह राहत उस भयंकर धक्के का इलाज कैसे करेगी, जो अर्थव्यवस्था को रोज लग रहा है? सफेद धन की ही बधिया रोज बैठ रही है।

राष्ट्रीय संकट में फंसे इस देश की संसद का बर्ताव भी अजीब है। न तो सत्तापक्ष किसी जिम्मेदारी का परिचय दे रहा है और न ही विपक्ष। यदि बड़बोले प्रधानमंत्री ने दुम दबा रखी है तो विपक्ष भी डंडे बजाने के अलावा क्या कर रहा है? यह ठीक है कि विपक्ष जनता के दुख-दर्द को जोरों से उठा रहा है लेकिन वह ऐसे कोई ठोस सुझाव नहीं रख रहा है, जिससे जनता को जल्दी से जल्दी और ज्यादा से ज्यादा राहत मिले। काले धन, रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के विरुद्ध नेता स्वयं अपने आचरण से जनता को कोई प्रेरणा नहीं दे रहे। सरकार न तो नेताओं के घरों पर छापे मारने की हिम्मत कर रही है और न ही नेता लोग अपना काला धन खुले-आम उजागर कर रहे हैं। काले धन और भ्रष्टाचार के मूल स्त्रोत हमारे नेतागण हैं। वे एक-दूसरे की टांग-खिंचाई करते हैं ताकि उनकी करतूत पर पर्दा पड़ा रहे।

लेखक परिचय: डॉ. वेदप्रताप वैदिक हिन्दी के वरिष्ट पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। उनका जन्म एवं आरम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश के इन्दौर नगर में हुई। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने के की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।