पानी बचाओ

suresh mishr
मान लो,सम्मान लो, उन्वान लो,
युद्ध जल बिनु ही छिड़ेगा जान लो।
मान मत खुद को सिकंदर,
बढ़ रहा देखो समुंदर,
सिसकती धरणी पुकारे-
घट रहा जल,रोज अंदर।
आ रहा संकट निकट, संज्ञान लो,
युद्ध जल बिनु ही छिड़ेगा जान लो।
मेघ अलसाने लगे हैं,
पेड़ कुम्हलाने लगे हैं,
सूखते सरवर बेचारे-
गम नजर आने लगे हैं।
एक आहट है,इसे पहचान लो,
युद्ध जल बिनु ही छिड़ेगा, जान लो।।
तुम गिरोगे,हम गिरेंगे,
इस धरा पर बम गिरेंगे,
नीर जिसके पास होगा
बस वहीं परचम फिरेंगे।
खून,पानी बिनु बहेगा मान लो,
युद्ध जल बिनु ही छिड़ेगा, जान लो।।
क्या करोगे खनिज प्यारे?
रत्न,हीरे,स्वर्ण सारे ?
नाम,शोहरत,धर्म,ओहदा
नीर के बिनु सब वृथा रे।
‘अब अपव्यय ना करेंगे’ ठान लो।
युद्ध जल बिनु ही छिड़ेगा, जान लो।।

                                                                                     #सुरेश मिश्र

परिचय : सुरेश मिश्र मुम्बई में रहते हैं। आप वर्तमान में हास्य कवि के रुप में कई मंचों से काव्य पाठ करने के अनुभवी हैं। कवि सम्मेलनों में मंच संचालन भी करते हैं।

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