अनसुलझा हुआ सा हूँ
थोड़ा सुलझा दो मुझे भी
कंही खोया हुआ सा हूँ
खुद से मिला दो मुझे भी
..
नही मिला पाओगे मुझे
मुझमे ही डूब जाओगे
हां पता है मुझे….
वो साथ मेंरे यूँ चलना तेरा
हाथो में हाथ मेरे रखना तेरा
वो हँसी पे यूँ हँसना तेरा
भूल गयी हो तुम सब
हा पता है मुझे…
घने कोहरे में मचलना तेरा
बारिश पे भींग जाना तेरा
वो आँखों में आँख डालना तेरा
खो गयी हो तुम कँही
हा पता है मुझे…
अनसुलझा ही सही
सुलझा दो मुझे
हकीकत में ना सही
ख्वाबो में फिर..
वैसे खुद से मिलवा दो मुझे..
नही कर पाओगी तुम…
हा पता है मुझे…
परिचय :
नाम-. मो.आकिब जावेद
साहित्यिक उपनाम-आकिब
वर्तमान पता-बाँदा उत्तर प्रदेश
राज्य-उत्तर प्रदेश
शहर-बाँदा
शिक्षा-BCA,MA,BTC
कार्यक्षेत्र-शिक्षक,सामाजिक कार्यकर्ता,ब्लॉगर,कवि,लेखक
विधा -कविता,श्रंगार रस,मुक्तक,ग़ज़ल,हाइकु, लघु कहानी
लेखन का उद्देश्य-समाज में अपनी बात को रचनाओं के माध्यम से रखना
Fri Apr 12 , 2019
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