वीरांगना लक्ष्मीबाई

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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई के बलिदान दिवस 18 जून पर विशेष 
अश्व पर  बैठी मर्दानी
हाथों में लेकर कृपाल ।
पवन वेग-सी गति चल
पडी बन शत्रु का काल ।।
कण-कण में भर ज्वाला
रण में बनी थी वह चंडी ।
इसकी   देखकर  वीरता
नतमस्तक हुए थे घमंडी ।।
नाना के  संग  सीखें गुर
युध्द में लडी अकेली थी ।
बरछी , कृपाल ,  कटारी
ढाल  उसकी  सहेली थी ।।
कमर में बांध नौनिहाल
जोश से लडी मर्दानी थी ।
आंखों  में  भरकर  रक्त
शत्रु संहार की ठानी थी ।।
जिसकी गाथा गूंज रही
आज भी रण मैदानों में ।
जहाँ खडी है लक्ष्मीबाई
शेरनी-सी बन मर्दानों में ।।
देश  की  आन-बान-शान
के लिए वह खूब लडी थी ।
वह  वीरता  का  अवतार
नारी शक्ति का प्रमाण थी ।।
प्रथम   स्वतंत्रता   संग्राम
की  वह  वीर  सेनानी थी ।
अंग्रेज थर्रा गए देख शौर्य
ऐसी वह झांसी की रानी थी ।।

 # गोपाल कौशल

परिचय : गोपाल कौशल नागदा जिला धार (मध्यप्रदेश) में रहते हैं और रोज एक नई कविता लिखने की आदत बना रखी है।

 

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