पिता का विश्वास

devendr soni
अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आँखों से अविरल धारा वह रही थी । वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे – आगे चल जरूर रहा था पर उसका मन उसी तेजी से पीछे भाग रहा था।  साथी उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहे थे पर वह जानता था ये आंसू दरअसल उसके मन में चल  रहे प्रायश्चित के आँसू भी हैं ।
उसे रह रह कर अफ़सोस हो रहा था कि वह अपने पिता के कहे अनुसार क्यों नही चला। क्यों उसने वह सब किया – जिनसे पिता हमेशा दूर रहने के लिए कहते थे ।
बेचैन मन लिए वह जैसे तैसे थके कदमों से घर पहुंचा पर अब उसे कोई कुछ बोलने वाला नही था । कोई उसे प्यार और निस्वार्थ भाव से समझाने वाला नही था। वह एकांत में जाकर फिर फूट फूट कर रोने लगा ।     उसे लग रहा था कि – हो न हो , उसका विजातीय विवाह ही पिता की मृत्यु का कारण बना है । अभी पिछले महीने ही तो उसने पिता को बताए बिना अपनी मर्जी से मंदिर में शादी की है । एक बार भी उसने पलट कर पिताजी का आशीर्वाद लेना उचित नही समझा और शहर से बाहर चला गया । बिना यह सोचे कि उसके बगैर मां पिताजी का क्या हाल होगा ।
कैसा डर था यह , कैसी सम्वादहीनता पसरी थी पिता – पुत्र के बीच  जिसने उसे अपने पिता का सामना भी नही करने दिया । काश ! वह एक बार तो अपने मन की बात पिता से कहता । पिताजी तो उससे कितना प्यार करते थे …और मां । मां से ही बता देता । शायद , नहीं …नहीं …पक्के से पिताजी उसकी शादी मनोरमा से ही करा देते । वे तो जात -पांत मानते ही नही थे । क्या वे अपने इकलौते पुत्र की बात नही मानते । जरूर मानते । उसने ही गलती की है जिसकी इतनी बड़ी सजा उसे मिली है। अब वह माफ़ी मांगे भी तो किससे मांगे ? क्या समय लौट कर आ सकता है।
तभी मनोरमा की मार्मिक आवाज से सिद्धार्थ की तन्द्रा टूटी । वह कह रही थी – अपने को सम्हालो सिद्धार्थ । अब मांजी को देखो । उनका रो रो कर बुरा हाल हो रहा है। बार बार अचेत हो रही हैं । मैने डॉक्टर अंकल को फोन कर दिया है । वे आते ही होंगे । अब चलो भी । कब तक मां का सामना नही करोगे । मां ने हमें माफ़ कर दिया है। मुझे बेटी कहकर गले लगाया है। अब से मैं ही उनकी देखभाल करूंगी। आप जरा भी चिंता न करें और मां से मिल लें ।
मनोरमा की बातों से सिद्धार्थ थोड़ा सम्हला। खुद को संयत कर वह मां के कमरे में उनसे लिपट कर रोने लगा ।
तीसरे दिन , सिद्धार्थ ने जब पिताजी की अलमारी खोली तो उसमें एक खत मिला जिसके ऊपर लिखा था- प्रिय बेटे सिद्धार्थ।
थरथराते हाथों से सिद्धार्थ ने चिट्ठी खोली ।
लिखा था – सिद्धार्थ । तुम इतने बड़े कब से हो गए कि – अपने जीवन का निर्णय खुद कर लिया । मुझे बताया भी नही । एक बार मुझसे या अपनी मां से कहकर तो देखते । कितनी धूमधाम से करते हम तुम्हारी शादी । बचपन से आज तक तुम्हारी खुशियां ही तो देखी है । जानता हूँ – तुम जिद्दी स्वभाव के रहे हो लेकिन यह नही जानता था कि तुम मुझसे इतना डरते हो । नहीं जानता – तुमने बिना बताए शादी मेरे डर की वजह से की या कोई और कारण था । यदि हर बेटा ऐसा करेगा तो माता पिता का तो अपने बच्चों पर से विश्वास ही उठ जाएगा ।
खैर , जो हुआ सो हुआ । जब भी घर लौटो । इस विश्वास से लौटना कि यह घर तुम्हारा है । हम तुम्हारे हैं।
अंत में लिखा था – काश ! तुम मेरे रहते लौट आओ। तुम और तुम्हारी माँ नहीं जानते , मुझे ब्लड कैंसर है। यदि तुम्हारे लौटने से पहले ही मैं दुनिया छोड़ दूँ तो मन में यह बोझ लेकर नहीं जीना कि मेरी मृत्यु तुम्हारे कारण हुई है। बहू को मेरा आशीष।
अपनी माँ का ख्याल रखोगे , इतना विश्वास है मुझे।
– तुम्हारा पिता ।
#देवेन्द्र सोनी , इटारसी । 

matruadmin

Next Post

आ सेतु हिमाचल

Mon Jun 18 , 2018
आज मन की बातें उठे विचार . भारत हिंदुस्तान बना. अखंड भारत को हमने सिन्धु प्रान्त माना.  विदेशी जो भी दें , उसे मानना ही हमारा गर्व. माँ को मम्मी, पिता को डैडी यह सीखने २५०००/ साधारण स्कूल में. बच्चा भूल से पिता कहें , तो पच्चीस हज़ार बाढ़ में.. […]

पसंदीदा साहित्य

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।