आ सेतु हिमाचल

0 0
Read Time2 Minute, 12 Second

cropped-cropped-finaltry002-1.png

आज मन की बातें उठे विचार .

भारत हिंदुस्तान बना.
अखंड भारत को हमने सिन्धु प्रान्त माना. 
विदेशी जो भी दें , उसे मानना ही हमारा गर्व.
माँ को मम्मी,
पिता को डैडी यह सीखने २५०००/ साधारण स्कूल में.
बच्चा भूल से पिता कहें , तो पच्चीस हज़ार बाढ़ में..

दिल्ली दिल छोड़ डेल्ही कहें तो चतुर .
हिंदुस्तान इण्डिया बन गया..खुश,

नतीजा भारतीय शुद्ध भाषा में
बिना मिलावट के बोलना गंवार.
आ सेतु हिमाचल, अब बन गया
मजहबी संघर्ष भूमि.
कदम कदम पर मंदिर ,मस्जिद ,गिरिजा घर.
जितने देवालय बढ़ते उतने ही मनुष्यता बढ़ती
पर स्वार्थ मजहबी नेता तोड़ देते एकता.
आपस में लड़वाकर आचार्य/मौलवी/पादरी
बैठ जाते स्वर्ण आसन पर.
आम जनता धर्म को लेकर लड़ते,
पर देवालयों के मुखिया की कोई चिंता नहीं ,
वह तो दिन ब दिन अम्बानी सम साधुसंत
बन्ने होड़ लगाता.
बेचारा भक्त बिना खाए ,पिए ,भोगे
हुंडी में डालता
अपनी मेहनती कमाई.
पर नहीं भगवान् पर अटल विश्वास
जितना रखते पुजारी, मौलवी ,पादरी दलाली पर.
वे अपने अपने ईश्वर को ही बड़ा कह
चिढाता, छेड़ता, लड़ाता ,
मौज में अपने सपनों का साकार बनाता.
जागो जागो भक्तो ,
भगावन पर रखो भरोसा.
भक्ति सिखाती इंसानियत , अहिंसा भाई चारा,
भक्ति के नाम लड़ना लड़ाना बेवकूफी जान.
सीधे भगवान से ,खुदा से ,गाड से संपर्क रखो.
ये बीच के दलाल अपने पेट भरने ,सप्पत्ति जोड़ने
आदिकाल से लड़ते ,लड़ाते. लड़वाते
अपने स्वार्थ साधना में लगते रहते.
बुद्धिमान ,चतुर ,होशियार बनो.
इन मानव मानव में लड़वाने के दलालों से बचो.

           #सेतुरमण आनंदकृशनन

matruadmin

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Next Post

शि‍क्षा और स्वास्थ से कब तक दूरियां

Mon Jun 18 , 2018
 रोटी-कपडा-मकान जीवन के अनिवार्य तत्व थे,  दौर में दवाई-पढाई-कमाई-आवाजाई और वाई-फाई जुड गए हैं । क्या इनके बिना अब जीवन की कल्पना की जा सकती हैं, कदाचित नहीं ! हम बात करें शि‍क्षा और स्वास्थ्य की तो वह दयानतहारी बनी हुई हैं, उसमें सुधार की और अधि‍क गुजांईश है। गौरतलब संविधान में शि‍क्षा और स्वास्थ्य […]

संस्थापक एवं सम्पादक

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।