यूं नहीं आती हैं फसलें
खेत की मिट्टी से प्रिये,
ये पसीना बूंद बनकर
बीज के कानों में कहता,
आना है कुछ ही समय में
तुमको धरा की पीठ पर,
तृप्त करना है मनुज की
हर कामना तुमको।
देह झांकती हो भले
इस जीर्ण चिर से,
पर मुझे चिंता तुम्हारी
दे रहा मुस्कान तुमको।।
#कार्तिकेय त्रिपाठी
परिचय : कार्तिकेय त्रिपाठी इंदौर(म.प्र.) में गांधीनगर में बसे हुए हैं।१९६५ में जन्मे कार्तिकेय जी कई वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं में काव्य लेखन,खेल लेख,व्यंग्य सहित लघुकथा लिखते रहे हैं। रचनाओं के प्रकाशन सहित कविताओं का आकाशवाणी पर प्रसारण भी हुआ है। आपकी संप्रति शास.विद्यालय में शिक्षक पद पर है।
Mon Jun 12 , 2017
आईना तब से चिढ़ने लगा, प्यार जब से तू करने लगा। गली में कभी चौबारे खड़ा, रास्ता मेरा तू तकने लगा डर है मुझे तब लगने लगा सरेआम जब तू मिलने लगा। प्यार जब से….। मुलाकातें हुईं अफसाना बना, मैं दीवानी हुई तू दीवाना लगा सब पराए हुए तू सगा […]