संदेह 

devendr soni
जब तक स्मार्ट फोन नही आए थे – रमेश और सुधा का दाम्पत्य जीवन हँसी – खुशी से बीत रहा था । शादी के इन पांच सालों में छूट पुट घरेलू अनबन को छोड़कर ऐसा कुछ नहीं घटा था जो उनके जीवन में बिखराव का कारण बनता ।
हर महीने रमेश अपनी सेलरी सुधा के हाथों में रखकर घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता । सुधा उसकी और अपने दोनों बच्चों की हर जरूरत का ध्यान रखते हुए भविष्य के लिए पर्याप्त बचत भी कर लेती । दिन भर घर के रोजमर्रा के कामों से निपट कर बच्चों  की पढ़ाई पर अपना ध्यान केंद्रित करती और बचा समय रमेश पर लुटा देती ।
समय तेजी से आगे बढ़ता गया और दोनों बच्चे पढ़ाई के लिए बोर्डिंग में दाखिल हो गए। अब सुधा का समय नही कटता । घर के भी कितने काम करे।
तभी एक दिन दोपहर को सुधा से मिलने उसकी सहेली रश्मि आई । खूब बाते हुईं दोनों के बीच और बातों ही बातों में रश्मि ने सुधा को अपना स्मार्ट फोन दिखाते हुए कहा – सुधा , तू भी ले ले एक फोन । सब कुछ है इसमें । आराम से समय भी कटेगा और तेरी रुचियाँ भी परिष्कृत होंगी ।
पहले तो सुधा ना नुकुर करती रही पर फिर मन ललचा गया । रमेश से जब सुधा ने फोन की फरमाइस की तो वह दूसरे ही दिन दो फोन ले आया । अब दोनों को आपसी संवाद में आसानी हो गई।
कुछ दिन तक सब ठीक रहा लेकिन फिर वे एक दूसरे के ” लास्ट सीन ” चेक करने लगे । बस यहीं से दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति संदेह ने अपने पैर पसारना शुरू कर दिया । अब बात बात पर दोनों में तकरार होने लगी और आरोप – प्रत्यारोप के साथ वे एक दूसरे को झूठी सफ़ाई देने लगे पर कहते हैं न – एक बार मन में शक का बीज रोपित हो जाए तो फिर यह बिना फलित हुए नहीं रहता।
हुआ भी वही आपसी विश्वास के खत्म होते ही दोनों ने अलग हो जाने का फैसला ले लिया । यह भी न सोचा बच्चों के भविष्य का क्या होगा ।अलग अलग रहते हुए दोनों ही अपनी जिद्द पर अड़े रहे अन्ततः आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दे दी ।
अदालत में  कई दिनों बाद उनका आमना सामना हुआ तो दोनों की आँखे नम थीं । मन के किसी कोने में किए गए संदेह के लिए प्रायश्चित का भाव था । इतने दिनों से दूर रहने का दुख साफ झलक रहा था ।
अन्ततः , उन दोनों के बीच कई दिनों की पसरी सम्वाद हीनता को खत्म करते हुए रमेश ने कहा – सुधा । क्या एक बार मुझे माफ़ नही करोगी । तुमसे दूर रहकर मैने जाना – नहीं रह सकता मैं तुम्हारे बिना । जब से तुम गई हो – मैने फोन का उपयोग ही नहीं किया और न ही कोई ” लास्ट सीन ” चेक किया । हमारे बीच  इस लास्ट सीन से ही संदेह उपजा था । मैं वादा करता हूँ – अब कभी तुम पर संदेह नहीं करूंगा ।
लौट आओ – सुधा । तुम्हारा घर , तुम्हारा इंतजार कर रहा है ।
बिना कुछ कहे , सुधा पलटी और अपने वकील से कागजात लेकर उनके टुकड़े – टुकड़े कर हवा में उछालते हुए बोली – रमेश , अब हमारे बीच पनपा संदेह भी हवा हो गया है । आओ घर चलें ।
      # देवेन्द्र सोनी , इटारसी ।

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