अंधी रेहड़,  काने गड़रिये

jayram shukl
घर से निकलते ही काना दिख जाए तो उसे बड़ा अशुभ मानते थेे।लोग रास्ता बदल देते थे या यात्रा रद्द कर देते थे। उन दिनों गाँवों में ऐसे टोटकों का रिवाज था।(टीवी चैनल तो इसे और पुख्ता करने में जुटे हैं) पढे़ लिखे लोग भी झांसे में आ जाते थे।
लोगों को याद होगा कि एक बार एक बड़े नेताजी चुनाव का पर्चा दाखिल करने जा रहे थे तो उनके कार के आगे से एक काली बिल्ली गुजर गई। काफिला वहीं रुक गया। काफिले में मुहूर्त निकालने वाले ज्योतिषी, स्वस्ति वाचक पंडित, तांत्रिक भी वैसे ही शामिल थे जैसे कि कानूनी पेंच जानने वाले वकील और प्रस्तावक,समर्थक। राय बनी कि इस अशुभ का उपचार ह़ो। फिर चूंकि वक्त कम था इसलिए एक तरफ पर्चा भरा जा रहा था तो दूसरी तरफ काली हांडी,काली उडद का तांत्रिक उपचार।
मुझे तब भी ये फालतू की बातें लगती थीं और आज भी लगती हैं। पर ये जरूर सोचा करता था कि यदि ये रिवाज सालों साल से चले आ रहे हैं तो इसमें कोई न कोई गूढ अर्थ जरूर छुपा होगा।
हमारे पुरखे इतने मूर्ख तो नहीं ही होंगे कि बेमतलब का कोई कर्मकांड रच दें। दरअसल जब कोई कर्म अपने अर्थ खो देता है तो वह कांड में बदल जाता है। जबकि उसकी शुरुआत निश्चित ही किसी न किसी सीख के लिए होती है।
अब जैसे रास्ते में काना आदमी के मिलने को अशुभ से जोड़ने की बात। मेरे हिसाब से इसके गूढ अर्थ का सरलीकरण ये कि दरअसल उस व्यक्ति की एक आँख फूटी हुई नहीं होती। वह होता दो आँखों वाला आदमी ही है पर उसकी दृष्टि एकांगी होती है। वह एक आँख से देखता है जो उसकी सुविधा और स्वार्थ की दृष्टि से उपयुक्त होता है। वह एकांगी और एकपक्षीय होता है। दूसरा पक्ष देखने वाली आँख सदैव बंद रहती है।
पुरखों की सीख शायद यह रही होगी कि ऐसा व्यक्ति कभी सही रास्ते में नहीं ले जाता। हर मसले को एक नजर से ही देखने वाला प्रकारांतर में काने में बदल दिया गया और यह टोटके में परिवर्तित हो गया।
यह सही है कि आदमी निरपेक्ष और प्रकृति की तरह समदर्शी नहीं होता। गुणदोष के हिसाब से उसका झुकाव हो ही जाता है। शायद इसलिए न्याय की देवी की आँखों में पट्टी बँधी होती है। तराजू में तथ्य,तर्क और सबूत को तौलकर न्याय नहीं, फैसला सुनाया जाता है। इसलिए कानून पर अंधे होने का लोकलाँछन लगता है।
धृतराष्ट के बारे में भी मेरी यही मान्यता है। चित्रकारों ने महाभारत में वर्णित उसके चरित्र को पढ़ समझकर अंधे की छवि बना दी। वस्तुतः धृतराष्ट्र की दोनों आँखें सलामत थीं  लेकिन उसपर पुत्रमोह का ऐसा परदा पड़ा था कि दूसरा और कुछ दिखता ही नहीं था। द्रोपदी को भरी सभा में नंगा किया जा रहा है धृतराष्ट देखकर भी अंधा है क्योंकि दुर्योधन का सुख इसी में है। शकुनि को लँगडा और भेंगा चित्रित किया गया है क्योंकि उसे सिर्फ़ कौरवों का हित और उसके लिए उसका एकनिष्ठ विचार ही दिखता है। प्रतीकों की भी अपनी सत्ता होती है वे गूंगे रहकर भी काफी कुछ कह देते हैं।
हमारे देश में ऐसे ही काने लोगों की भरमार है। वे दोनों आँखों से देखना ही नहीं चाहते। किसी की दांई फूटी है तो किसी की बांई। ये अपनी अपनी गली को ही राजमार्ग बताते हैं। वे जो देखते हैं तो उनकी जिद रहती है कि देश वही देखे। वे अपनी सुविधा के हिसाब से अपने हिस्से का सच तय करते हैं।
 ढ़ोगीबाबा की पोल खोलने वाला वह साहसी संपादक इनके पाले का नहीं था। जो कर्नाटक में संपादिका कतल कर दी गई वो उनके पाले की नहीं है। वे तमाम पत्रकार जो छोटे शहरों, कस्बों में पत्रकारिता करते हुए मारे जाते हैं,अंगभंग कर दिए जाते हैं,पुलिस झूठे मुकदमें लगाकर जेल भेज देती है, वे बेचारे सब के सब अभागे थे जो न दाएं थे न बाएं थे। इसलिए .।कनमों.को नहीं दिखे। इनके लिए न मोमबत्ती जुलूस न शोक सभा,न अभिव्यक्ति पर हमला। ये सब इन इलीट एक्टविस्टों के भी पाले के नहीं थे।
केरल और पश्चिम बंगाल में बोटी बोटी काट दिये गए लोग उनके पाले के थे। वे इनके एजेडे में फिट नहीं बैठते। ये वो लोग हैं कि चीन के थियानमन चौक पर लोकतांत्रिक आजादी मांग रहे तरुणों पर जब टैंक चढा़ दिया जाता है तब इनकी एक आँख फूट जाती है और ये पीपुल्स आर्मी के उस पराक्रम को कदम ठोककर सैल्यूट करते हैं।
बस्तर के जंगलों में माओवादी, जवानों को छलनी करते व सुरंगों से उड़ा देते हैं, तब इन कानों की काकटेल पार्टियां खराब नहीं होतीं। .लेके रहेंगें आजादी, भारत तेरे टुकड़े होंगे..का उद्घोष करने वाले इनकी गोदी में खेलने वाले लाडले क्रांतिकारी हुआ करते हैं। दूसरी आँख परमानेंट बंद।
वैचारिक तौर पर ये काने लोग देश की जनता को अंधी रेहड़ समझते हैं और सोचते हैं हम जहाँ हाँकेगे यह उसी दिशा की ओर जाएगी..।  इसलिए मैं कहता हूँ कि पुरखों की चेतावनी को समझो ..और जब भी घर से निकलो तो इन कानों से बचबचाकर। ये वाकई अशुभ होते हैं।
(यह लेख पिछले साल आज के ही दिन प्रसारित)
#जयराम शुक्ल
परिचय: जबलपुर निवासी जयराम शुक्ला जी तीस वर्ष तक सक्रिय पत्रकारिता में रहें| देशबंधु, दैनिक भास्कर, पीपुल्स समाचार व कई अन्य अखबारों में संपादकीय दायित्व के बाद अब बतौर प्राध्यापक माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि. में अध्यापन। 1985 से नियमित स्तंभ लेखन देशभर की पत्र पत्रिकाओं व पोर्टल में। पाँच हजार से भी ज्यादा लेख..। पुस्तक भी है लेकिन वन्यजीव पर.. Tale of the White tiger सफेद बाघ की कहानी। साँच कहै ता मारन धावै स्तंभ देश भर में चाव से पढ़ा जाता है। वनस्पति विग्यान, इतिहास में स्नातकोत्तर, विधि व पत्रकारिता में स्नातक। 

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