रूप के भँवरे चुराने जब लगें नज़रें,
जब ढले श्रृंगार का मौसम चले आना।
हो अकेलापन कभी महसूस जब तुमको, हर कदम पर साथ देंगे हम चले आना॥
आँख में है झील की गहराईयाँ,
तन-बदन में है अजंता की झलक।
रूप का दरिया यकींनन हो अभी, तुम शिखर से पाँव की पायल तलक॥
रूप से घटने लगे जब मोह अपनों का, बात आँखों को करें जब नम चले आना…।
हो अकेलापन कभी महसूस जब तुमको, हर कदम पर साथ देंगे हम चले आना…॥
जब समय की गर्द से ये रूप की, चाँदनी कमज़ोर-सी पड़ने लगे।
यौवनी उल्लास के मधुमास पर, पतझरी साया घना पड़ने लगे॥
शाम की रंगीनियाँ बदलें उदासी में, बढ़ चले जब ज़िन्दगी में तम चले आना…।
हो अकेलापन कभी महसूस जब तुमको, हर कदम पर साथ देंगे हम चले आना…॥
चाह अपनी तो अलौकिक प्रेम है, देह की चाहत नहीं हमको सनम।
तुम हमें अपना बनाओ या नहीं, तुम रहोगे चाहतों में हर जनम॥
देह के सुख से कभी जब ऊब जाए मन, हम बनेंगे रूह के हमदम चले आना…।
हो अकेलापन कभी महसूस जब तुमको, हर कदम पर साथ देंगे हम चले आना…॥
#सतीश बंसल
परिचय : सतीश बंसल देहरादून (उत्तराखंड) से हैं। आपकी जन्म तिथि २ सितम्बर १९६८ है।प्रकाशित पुस्तकों में ‘गुनगुनाने लगीं खामोशियाँ (कविता संग्रह)’,’कवि नहीं हूँ मैं(क.सं.)’,’चलो गुनगुनाएं (गीत संग्रह)’ तथा ‘संस्कार के दीप( दोहा संग्रह)’आदि हैं। विभिन्न विधाओं में ७ पुस्तकें प्रकाशन प्रक्रिया में हैं। आपको साहित्य सागर सम्मान २०१६ सहारनपुर तथा रचनाकार सम्मान २०१५ आदि मिले हैं। देहरादून के पंडितवाडी में रहने वाले श्री बंसल की शिक्षा स्नातक है। निजी संस्थान में आप प्रबंधक के रुप में कार्यरत हैं।