परास्त-ज्ञान

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chandra sayata
     रमनसिंह सब्जियां लेकर मुड़ा ही था कि उसने अनायास सामने पड़ गए मिश्र जी से दो-तीन सवाल एक साथ कर डाले-‘कैसे हैं सर ?,प्रैक्टिस  कैसी चल रही है ?,आप यहां कैसे?’
– ‘एकदम ठीक’, मिश्र जी ने पहले सवाल का जवाब देना ही काफ़ी समझा।
   ज्ञानसिंह मिश्र और रतनसिंह कभी एक ही कार्यालय में काम करते थे।रतनसिंह कनिष्ठ रहा था।
दोनों ही सेवानिवृत गुरु- शिष्य का आज अचानक यूं सब्जी-मंडी में मिलन  हो गया।
   रतनसिंह को अनायास कुछ याद होआया-‘अरे सर,परसों पेंशनर्स एसोसिएशन की बैठक है। कार्यकारिणी के चुनाव भी हैं।’
 ‘हूँ,मुझे मालूम है’ । गम्भीर स्वर में मिश्र जी ने कहा।
  ‘सर पर, चुनाव के लिए न कोई नोटिस निकला,न ही फार्म भरे गए,न ही पलों की घोषणा की गई।’ साश्चर्य रतनसिंह ने अपेक्षित उत्तर की अपेक्षा के साथ कहा।
     मिश्र जी के गहन-गम्भीर मुखमंडल पर एक विद्युत-लेख मचलकर चली गई।
 ‘एसोसिएशन, वह तो घर की बात है। यहां सब चलता है।’
कहते हुए मिश्र जी आगे बढ़ ‌गए।रतनसिंह को मालूम था कि मिश्र जी अध्यक्ष पद के दावेदार थे,जो उन्हें मिलना तय था, इसलिए पंजीकृत संस्था के चुनाव-नियमों को उठाकर ताक पर रख दिया। स्वार्थ के आगे ज्ञान परास्त हो चुका था।
#डॉ.चंद्रा सायता
परिचय: मध्यप्रदेश के जिला इंदौर से ही डॉ.चंद्रा सायता का रिश्ता है। करीब ७० वर्षीय डॉ.सायता का जन्मस्थान-सख्खर(वर्तमान पाकिस्तान) है। तत्कालिक राज्य सिंध की चंद्रा जी की शिक्षा एम.ए.(समाजशास्त्र,हिन्दी साहित्य,अंग्रेजी साहित्य) और  पी-एचडी. सहित एलएलबी भी है। आप केन्द्र सरकार में अधिकारी रहकर 
जुलाई २००७ में सेवानिवृत्त हुई हैं। वर्तमान में अपना व्यक्तिगत कार्य है। लेखन से आपका गहरा जुड़ाव है और कविता,लघुकथा,व्यंग्य, आलेख आदि लिखती हैं। हिन्दी में ३ काव्य संग्रह, सिंधी में ३,हिन्दी में २ लघुकथा संग्रह का प्रकाशन एवं १ का सिंधी अनुवाद भी आपके नाम है। ऐसे ही संकलन ७ हैं। सम्मान के तौर पर भारतीय अनुवाद परिषद से, पी-एचडी. शोध पर तथा कई साहित्यिक संस्थाओं से भी पुरस्कृत हुई हैं। २०१७ में मुरादाबाद (उ.प्र.) से स्मृति सम्मान भी प्राप्त किया है। अन्य उपलब्धि में नृत्य कत्थक (स्नातक), संगीत(३ वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण),सेवा में रहते हुए अपने कार्य के अतिरिक्त प्रचार-प्रसार कार्य तथा महिला शोषण प्रतिरोधक समिति की प्रमुख भी वर्षों तक रही हैं। अब तक करीब ३ हजार सभा का संचालन करने के लिए प्रशस्ति -पत्र तथा सम्मान पा चुकी हैं। लेखन कार्य का उद्देश्य मूलतः खुद को लेखन का बुखार होना है।

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One thought on “परास्त-ज्ञान

  1. सामान्य सी लगने वाली आये दिन होने वाली अनदेखियो को विषय बनाकर आपने इस कथा के माध्यम से पाठक का ध्यान खींचा है।

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29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।