कविता- प्रेम क्या है?

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प्रेम की बात को आप सुन न सको
शोर इतना नहीं मूक संसार में।

(1)
प्रेम सागर को भी, प्रेम गागर को भी,
प्रेम प्यासे को भी, प्रेम पनघट को भी,
प्रेम ने बैर झूठे चखे शबरी के,
प्रेम ने राह दिखलाई केवट को भी।

प्रेम की लात जो छू ले पत्थर भी तो
बन अहिल्या पूजाती है संसार में।

(2)
प्रेम सत्यम् शिवम्, प्रेम ही सुंदरम्,
पुस्तकों का सभी बस यही सार है,
पढ़ते-पढ़ते हुए लोग तोता यहाँ,
पढ़ न पाए जो जीवन की झंकार है।

प्रेम की बात को लिखने वाली कलम,
कौड़ियों में नहीं बिकती बाज़ार में।

(3)
हर कहानी में दुखड़ो का मेला लगा,
बीते गुज़रे हुए को क्यों रोते रहे?
आओ जीवन को मिलजुल के ऐसे जियें,
सुनने मन को लिए क्या ही रोते रहे!

प्रेम के हाथ को कैसे थामू भला,
वो अकेली रहे और मिलनसार में!

(4)
दूर रहकर भी हर पल रहूँगा यहीं,
सात जन्मों का रिश्ता नहीं तो नहीं,
तेरे वादे-कसम-प्रेम किससे रहे
मेरी दुनिया तू, मैं तेरा कुछ भी नहीं।

प्रेम की धार में तैरना सीख लो,
उसने छोड़ा मुझे आज मझधार में।

(5)
जिसने जाना नहीं प्रेम के मर्म को,
उससे बढ़कर नहीं होगा दुखिया कोई,
प्रेम से हार जाता है चेतन हृदय,
जीत सकता नहीं बोल से दुनिया कोई।

प्रेम की जात को कोई धमका सके,
ज़ोर इतना नहीं कोई तलवार में।

#चेतन जोशी
काँटाफोड़, मध्यप्रदेश

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