मिट्टी, मुस्कान और मेरे पापा की परछाई

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पूसा मेला 2026

सुबह की हल्की धूप में जब हम सहेलियाँ हँसते-बतियाते पूसा के विशाल द्वार तक पहुँचीं, तो लगा जैसे किसी मेले में नहीं, बल्कि स्मृतियों की देहरी पर खड़ी हूँ। सामने था वही प्रतिष्ठित परिसर, इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी पूसा, जहाँ कभी मेरे पापा जी ने मिट्टी की परतों में भविष्य पढ़ा था।


भीतर क़दम रखते ही एक सोंधी महक ने हमारा स्वागत किया। यह सिर्फ़ मिट्टी की ख़ुशबू नहीं थी; यह खेतों की साँस थी, किसानों की उम्मीद थी, और मेरे पापा की उपस्थिति थी। चारों ओर रंग-बिरंगे फूलों की कतारें, नई फसलों की प्रदर्शनी, उन्नत बीजों के स्टॉल, जैविक खेती के मॉडल, सब कुछ ऐसा सजा था जैसे धरती ने आज अपना उत्सव पहन लिया हो।
हम सहेलियों का साथ उस दिन किसी ताज़ी हवा के झोंके जैसा था। कभी हम हँसते हुए किसी स्टॉल पर रुक जातीं, कभी किसी नई क़िस्म के फूलों के सामने तस्वीरें खिंचवातीं। हमने चॉकलेट्स ख़रीदीं—मीठी, मुलायम, और बिल्कुल वैसी जैसे उस दिन की हमारी हँसी। पर यह मस्ती सिर्फ़ चॉकलेट्स तक सीमित नहीं थी; हम हर स्टॉल पर ठहरकर जानकारी भी ले रही थीं:- मृदा परीक्षण की विधियाँ, उन्नत खाद, जैव उर्वरक, नई तकनीकें आदि-आदि।

एक जगह फूलों के बीजों की थैलियाँ सजी थीं। उन्हें हाथ में लेते ही लगा जैसे हम रंगों के भविष्य को अपनी हथेली में थामे हुए हैं। खाद के पैकेट लेते समय मन में अनायास पापा की आवाज़ गूँजी, “मिट्टी को समझो, वही तुम्हें फल देगी।”
मिट्टी की परतों के चार्ट देखती तो लगता जैसे वे अभी आकर समझाएँगे—काली, दोमट, लाल… हर मिट्टी का स्वभाव अलग होता है गुड्डी, जैसे हर इंसान का। वे कहते थे कि धरती को पढ़ना सीखो, वह कभी धोखा नहीं देगी। आज उसी मेले में वैज्ञानिक किसानों को समझा रहे थे, और मुझे लग रहा था कि पापा की सीख अब भी इन हवाओं में तैर रही है।
किसानों के चेहरे पर जिज्ञासा थी, छात्रों की आँखों में सपने। कोई नई तकनीक के बारे में पूछ रहा था, कोई फसल की क़िस्म पर चर्चा कर रहा था। यह मेला सिर्फ़ प्रदर्शनी नहीं था, यह ज्ञान, परंपरा और प्रगति का संगम था।

दोपहर ढलते-ढलते हमारे क़दम थकने लगे, पर मन भरा नहीं था। हमने ठंडी छाँव में बैठकर बातें कीं, कुछ कुछ खाते खाते दिन भर की सीखी बातें साझा कीं। सहेलियों की हँसी और मिट्टी की ख़ुशबू मिलकर जैसे एक नया संगीत रच रही थीं।
शाम को जब हम बाहर निकलने लगे, सूरज सुनहरा हो चुका था। मैंने एक बार पीछे मुड़कर उस परिसर को देखा। आँखें हल्की-सी नम थीं, पर भीतर गर्व का उजाला था।
आज मैं वहाँ एक दर्शक बनकर गई थी, पर लौटी एक वैज्ञानिक की बेटी बनकर, जिसने जाना कि मिट्टी सिर्फ़ धूल नहीं होती, वह स्मृति होती है, विरासत होती है, जीवन की निरंतरता होती है।
पूसा मेला 2026 मेरे लिए सिर्फ़ एक दिन नहीं था, वह एक यात्रा थी, जहाँ देश की सोंधी ख़ुशबू में मेरे पापा की यादों की ख़ुशबू घुल गई थी।
जहाँ सहेलियों की हँसी ने शोक को भी हल्का कर दिया था, और जहाँ हर क़दम पर लगा,
“धरती अब भी उन्हें (मेरे पापा को) पहचानती है।”

#भावना शर्मा, नई दिल्ली

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