दीया-बाती का दर्द

archana dube

दीपक से हमने सीखा, जलना क्या होता है ।

तिल-तिल जल-जल करके, ऐसे मरना क्या होता है ।

दीपक सबको देती उजाला, खुद अधियारों में रहकर ।

सीख लो उससे जीना तुम भी, दुःख सहना होता है क्या ?

विरह व्यथा होती बड़ी दारूढ़, सहनाही पड़ता है ।

अपनों के खातिर अपने को, जलना ही होता है ।

क्या जाने इस राह पर हमको, छोड़के ऐसे जाओगे ।

कैसे तुम्हें बता दू मैं ये,जी नहीं हम पायेगें ।

कीट–पतंगे सीखा दिये मुझे, एक-दूजे के लिये मर जाओ ।

प्यार तुम्हारा सच्चा है तो, अपनों के लिए कुछ कर जाओ ।

सहना मुश्किल होता बड़ा है, जो सह ले उसकी तारीफ ।

दीपक जैसी सहन शक्ति रहे,कीटपतंगों जैसी रीति ।

चाह के खातिर जीते है हम, और बिछड़कर मर जाना ।

दीया बाती से सीखोंहरदम, एक दुसरे के लिए जल जाना ।

बड़ा कठिन यह बड़ा है मुश्किल, कैसे इसे अपनाओगे ।

इस जग में नहीं कोई ऐसा, जो तुमको समझ पायेगें ।

दीपक देता जहां उजाला, खुशहाली छा जाती है ।

दूजों को खुश करने में, अपना बलिदान चढ़ाती है ।

मरके भी जीना सीखों, कुछ काम यहां कर जाओं तुम ।

जीनें पर नहीं याद करेगें, मरने पर याद आओगे तुम ।

परिचय-

नाम  -डॉ. अर्चना दुबे

मुम्बई(महाराष्ट्र)

जन्म स्थान  –   जिला- जौनपुर (उत्तर प्रदेश)

शिक्षा –  एम.ए., पीएच-डी.

कार्यक्षेत्र  –  स्वच्छंद  लेखनकार्य

लेखन विधा  –  गीत, गज़ल, लेख, कहाँनी, लघुकथा, कविता, समीक्षा आदि विधा पर ।

कोई प्रकाशन  संग्रह / किताब  –  दो साझा काव्य संग्रह ।

रचना प्रकाशन  –  मेट्रो दिनांक हिंदी साप्ताहिक अखबार (मुम्बई ) से  मार्च 2018 से ( सह सम्पादक ) का कार्य ।

  • काव्य स्पंदन पत्रिका साप्ताहिक (दिल्ली) प्रति सप्ताह कविता, गज़ल प्रकाशित ।

  • कई हिंदी अखबार और पत्रिकाओं में लेख, कहाँनी, कविता, गज़ल, लघुकथा, समीक्षा प्रकाशित ।

  • दर्जनों से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रपत्र वाचन ।

  • अंर्तराष्ट्रीय पत्रिका में 4 लेख प्रकाशित ।

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