ऐसे मरते जाएंगे
कैसे हो निर्माण देश का,
जहाँ गुरु ही हो लाचार।
महीनों वेतन के लाले हों,
चाहे कितना रहे बीमार।
सभी सुविधाएँ भोग रहे हैं,
सत्ता जिनके हाथों में।
ला देंगे फिर से सड़कों पर,
धमकाते हैं बातों में।
वो क्या समझे दर्द किसी का,
जो करते हैं गगन विहार।
महीनों वेतन के लाले हों,
चाहे कितना रहे बीमार।
आज बीतती क्या उस घर में,
जिनका मालिक गुज़र गया।
कहने को तो राष्ट्र निर्माता,
घर में अश्रु पसर गया।
अगर समय पर वेतन मिलता,
हो सकता उनका उपचार।
महीनों वेतन के लाले हों,
चाहे कितना रहे बीमार।
कैसे कोई तन-मन देकर,
शिक्षा पुष्प खिलाएगा।
श्रद्धा के जब बोल नहीं तो,
ऐसे मरते जाएंगे।
सभी साथियों सोंचे-समझे,
आज समय की यही पुकार।
महीनों वेतन के लाले हों
चाहे कितना रहे बीमार॥
(एक शिक्षक की मौत की सत्य घटना पर आधारित )
#बिनोद कुमार ‘हंसौड़ा’
परिचय : बिनोद कुमार ‘हंसौड़ा’ का जन्म १९६९ का है। आप दरभंगा (बिहार)में प्रधान शिक्षक हैं। शैक्षिक योग्यता दोहरा एमए(इतिहास एवं शिक्षा)सहित बीटी,बीएड और प्रभाकर (संगीत)है। आपके नाम-बंटवारा (नाटक),तिरंगा झुकने नहीं देंगे, व्यवहार चालीसा और मेरी सांसें तेरा जीवन आदि पुस्तकें हैं। आपको राष्ट्रभाषा गौरव(मानद उपाधि, इलाहाबाद)सहित महाकवि विद्यापति साहित्य शिखर सम्मान (मानद उपाधि) और बेहतरीन शिक्षक हेतु स्वर्ण पदक सम्मान भी मिला है। साथ ही अनेक मंचो से भी सम्मानित हो चुके हैं