खिजा के फूल से
झर रहे हैं पल।
जिन्दगी की डाल से,
खुद से हैं सवाल से…?
रास्ते भटक गए हैं…
मोड़ पर अटक गए हैं।
शाम-सी तमाम है,
जिन्दगी की चाल भी।
रुके-रुके कदम कहीं,
झुका-सा आसमान भी।
अंधकार छा गया…,
रजनी बन आ गया…।
जुगनू चमक उठे,
तारे सब दमक उठे।
निशा ने विदाई ली,
खग दल चहक उठे।
सागर के पार से,
ऊषा के द्वार से
लालिमा मचल उठी।
धड़का धरा-हृदय
सुनहरी रश्मियां
सब तरफ बिखर गई।
कमल-दल खिल उठे,
भ्रमर राग बज उठे,
कोयल की कूक हूक
नदियां की तेज रेख
धारा बन बह चली।
उत्सवी हवा चली…,
जिन्दगी से मिल गई।
राग-रंग भर गए,
जीवन संगीत बना,
मीत-गीत बन गए॥
#निकेता सिंह `संकल्प`(शिखी)
परिचय : निकेता सिंह का साहित्यिक उपनाम-संकल्प(शिखी) है। जन्मतिथि- १ अप्रैल १९८९ तथा जन्म स्थान-पुरवा उन्नाव है। वर्तमान में वाराणसी में रह रही हैं। उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव-लखनऊ शहर की निकेता सिंह ने बीएससी के अलावा एमए(इतिहास),बीएड, पीजीडीसीए और परास्नातक(आपदा प्रबंधन) की शिक्षा भी हासिल की है। आपका कार्यक्षेत्र-शिक्षण(शिक्षा विभाग) है। आप सामाजिक क्षेत्र में शिक्षण के साथ ही अशासकीय संस्था के माध्यम से महिलाओं एवं बच्चों के उत्थान के लिए कार्यरत हैं। लेखन में विधा-गीतकाव्य, व्यंग्य और ओज इत्यादि है। क्षेत्रीय पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती हैं।
सम्मान के रुप में आपको क्षेत्रीय कवि सम्मेलनों में युवा रचनाकार हेतु सम्मान मिला है। आप ब्लॉग पर भी लेखन में सक्रिय हैं तो उपलब्धि काव्य लेखन है। आपके लेखन का उद्देश्य-जनमानस तक पहुँच बनाना है।
Sat Dec 30 , 2017
ऐसे मरते जाएंगे कैसे हो निर्माण देश का, जहाँ गुरु ही हो लाचार। महीनों वेतन के लाले हों, चाहे कितना रहे बीमार। सभी सुविधाएँ भोग रहे हैं, सत्ता जिनके हाथों में। ला देंगे फिर से सड़कों पर, धमकाते हैं बातों में। वो क्या समझे दर्द किसी का, जो करते हैं […]