कलम सियासत नहीं लिखेगी

 rakhi sinh
क्यों  कलम चलाऊँ अपनी मैं इन राजनीति दरबारों पर,
क्यों विवश करुं लेखनी अपनी लिखने को गद्दारों पर।
इन्हीं सियासत की गलियों में रोज तमाशा होता है,
बुझ जाता है दीपक वो जो बस आशा का होता है॥
चंद सियासी कुनबे मेरा देश लूटकर बैठे हैं,
माथे पर इक शिकन नहीं है देखो कितना ऐंठें हैं।
कुछ दिन पहले माँ-बेटे को सत्ता जहर पिलाती थी,
पी लेना हँसकर विष बेटा,ऐसा ढोंग रचाती थी॥
सारी ए बी सी डी अब तो घोंटालों के नाम हुई,
है पवित्र सियासत इनकी,ये फिर भी न बदनाम हुई।
इसी सियासी बोझ तले बस कृषक हमारे रोते हैं,
क्यों सीमा पर हम रोज एक वीर बाँकुरा खोते हैं॥
कहाँ गया वो आज कभी जो छप्पन इंची सीना था,
जिन आदेशों पर वीरों को लहू शत्रु का पीना था।
बाँध दिए हैं कर उनके क्यों,दिल्ली के दरबारों ने,
दम नाक में कर रखा है पाकिस्तानी नारों ने॥
अब भारत की राजनीति  में नेता सुभाष चन्द्र नहीं,
अब सत्ता के गलियारों से कोई हमको आस नहीं।
चंद्रगुप्त नहीं रहा कोई जो चाणक्य बना जाए,
ऐसी अब राजनीति न ये,जिस पर आज लिखा जाए॥
लिखती नहीं कलम मेरी सत्ता की हर हलचल को,
बस लिखना चाहेगी ये अब  वीरों के पीड़ा पल को।
लिखने को है राम यहाँ पर जो न सीता के हो पाए,
औ मीराओं की आँखों में जो बनकर श्याम समाए॥

#राखी सिंह ‘शब्दिता'

परिचय : राखी सिंह का कलम नाम `शब्दिता` हैl आप फिलहाल बीएससी में अध्ययनरत हैंl आपका बसेरा गाँव नगला भवानी(खन्दौली) आगरा में हैl राखी सिंह की जन्म तिथि-१० अगस्त १९९९ हैl लेखन कार्य आपका शौक हैl

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