रविवार यानि छुटियों के दिन गांव में आकर जैसे मन आनंदित हो उठा। सुबह-सुबह खलिहान में बैठा मैं कभी पुआल से खेलता,कभी खेत की ओर निहारता। खुद से खेल-खेलकर थक-सा गया,सोचा आराम कर लूं तो पुआल बिछाया और लेट गया। सामने खेल रहे बच्चों क़ा वो गुल्ली-डंडा का खेल मुझे अपनी ओर आकर्षित करने लगा,सपनों में जैसे खोने से लगा। कुछ दोस्त हमारे होते थे और मैं भी कभी इसी तरह गाँव के अपने दोस्तों के साथ खेला करता था,न जीत-न हार, सिर्फ एक-दूसरे को प्यार भरे ताने के सिवाय और कुछ भी नहीं। आज मैं जीता,आज मैं जीता,उस स्वप्न को जैसे मैं खुली आँखों से आज देख रहा था। बच्चों ने मेरे उस स्वप्न को भांप लिया। एक ने आवाज दी-खेलोगे दादा,
नहीं,नहीं,मैं नहीं खेलता।
अरे आओ न दादा,सुनता हूँ गांव में,आप भी कभी इसके बड़े खिलाड़ी रहे हो।
वो मुझे ऐसे ललकार रहे थे जैसे मैं कोई छोटा बच्चा हूँ,और किसी बात पे रुठकर खेल से बाहर निकल गया हूँ और ताने के साथ मनाने की कोशिश अपने दोस्त को कर रहे हों।
अरे नहीं,मैं नहीं खेलता।
अरे आओ न दादा।
जब मन न माना तो उन बच्चों के साथ गुल्ली-डंडे के खेल में एक दल के साथ हो लिया। पता ही न चला,कितनी देर तक खेल चलता रहा। बचपन के इस खेल को मैं जीने लगा। ऐसा लग रहा था सब कुछ लौट आया हो,वही पुराने दोस्त जो हर बात पर झगड़ना,रूठना-मनाना सब जारी था। किसी ने कहा-दादा ये ठीक नहीं,किसी ने कहा-वो ठीक नहीं।
वो आनंद में चाहकर भी कभी नहीं पा सकता था। आज अपने गाँव में आकर फिर से जी गया था। माँ का बुलावा आया-अरे आओ नाश्ता तो कर लो या बच्चों के साथ यूं हीं खेलते रहोगे। तन्द्रा खेल की भंग हो गई।
अच्छा बच्चों फिर मिलते हैं-कहकर मैं नाश्ते के लिए जाने लगा,मगर आज फिर से अपना बचपन जी लिया था,जिसकी बहुत खुशी थी।
#प्रभात कुमार दुबे (प्रबुद्ध कश्यप)