कुछ रोशनी के छींटे आए नजर उधर से।
कोई गांव जल गया,लगता है एक पहर से॥
कुछ खुशबू भी है, सौंधी-सौंधी मिट्टी और राख की।
उबला हो जैसे आलू,बटुए में हल्के-हल्के॥
अंगड़ाईयां है, लेती मेरे मन की यह दीवारें।
शर्मा जाती है घासों की ये लम्बी कतारें॥
जब फूंकती हवा है,इन्हें कुछ दूर तक किनारे।
तब मेड़ पर लदी,ये करती है कुछ इशारे॥
आ! बैठ न, देख तो नजारा उस नदी के किनारे का
हां!!! शायद पीपल नहीं रहा,वह अपने घाट का॥
चुप न बैठ, बोल न विभा ??
क्या तेरा तुझे याद नहीं, कोई कल इधर का!!!
हां बावरी मैं जानती हूं अपना सच।
पर कब तक अभिशापित रहूं लेकर अपना सब्र॥
नहीं कहना चाहिए,सब कहते हैं पर!!
तू ही बता मेरी हकीकत,कब तक छुपाएगा आसमान तले अपना सर॥
#हेमा श्रीवास्तव
परिचय : हेमा श्रीवास्तव ‘हेमा’ नाम से लिखने के अलावा प्रिय कार्य के रुप में अनाथ, गरीब व असहाय वर्ग की हरसंभव सेवा करती हैं। २७ वर्षीय हेमा का जन्म स्थान ग्राम खोचा( जिला इलाहाबाद) प्रयाग है। आप हिन्दी भाषा को कलम रुपी माध्यम बनाकर गद्य और पद्य विधा में लिखती हैं। गीत, ‘संस्मरण ‘निबंध’,लेख,कविता मुक्तक दोहा, रुबाई ‘ग़ज़ल’ और गीतिका रचती हैं। आपकी रचनाएं इलाहाबाद के स्थानीय अखबारों और ई-काव्य पत्रिकाओं में भी छपती हैं। एक सामूहिक काव्य-संग्रह में भी रचना प्रकाशन हुआ है।
ई-पत्रिका की सह संपादिका होकर पुरस्कार व सम्मान भी प्राप्त किए हैं। इसमें सारस्वत सम्मान खास है। लेखन के साथ ही गायन व चित्रकला में भी रुचि है।