अनुशासन बंधन नहीं है। प्रकृति भी अनुशासित है। देखो न, पृथ्वी और सारे ग्रह अपनी निश्चित परिधि में निश्चित गति पर सूर्य के चक्कर लगाते हैं। दिन रात, मौसम चक्र, सब इसी प्रबंधन का परिणाम है। पृथ्वी यदि कह दे , मैं तो बोर हो गई, या थक गई, एक ही काम करते-करते, तो क्या हो? पेड़ कह दे, मैं ही हमेशा फल क्यों देता रहूं, बादल कह दे कि मैं बारिश क्यों करुं ? और तो और घड़ी की सुइयां भी अनुशासित हैं और नियत गति से घूमकर हमें सही समय दिखाती है।
अनुशासन को बोझ न समझा जाए तो यह जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। वास्तव में अनुशासित व्यक्ति सामान्य व्यक्ति से बेहतर काम करता है और ज्यादा काम करता है। वह ज्यादा स्वस्थ रहता है और कार्यकुशल होता है।
अब आप कहेंगे कि आजकल के बच्चों को अनुशासन सिखाना बहुत मुश्किल है तो याद रखिए ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बच्चे वही करते हैं जो वो बड़ों को करते देख रहे हैं। यदि वे इंकार कर रहे हैं कहना मानने से,तो यकीनन आप सचेत हो जाएं। कहीं न कहीं आप ही सही नहीं हैं।
अनुशासन का पहला भाग है-आत्मानुशासन, यानी स्वयं का स्वयं पर शासन,जैसे समय की पाबंदी,खान-पान पर सचेत रहना,अपना सामान व्यवस्थित रखना,साफ-सफाई का ध्यान रखना, साफ-सुथरे और सुंदर कपड़े पहनना, नियमित व्यायाम करना आदि। दूसरे भाग में आता है कि आप अन्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? जैसे बड़ों को सम्मान देना,छोटों को स्नेह,जरुरत पड़ने पर तन-मन-धन से मदद करना, कम बोलना,ज्यादा सुनना,विनम्रता और दया की भावना रखना तथा कार्यालय के काम समय पर पूरे करना आदि।
इस तरह एक अनुशासित व्यक्ति व्यवहारिक स्तर पर पसंद किया जाता है, बल्कि अपनी अनुशासन में रहने की आदत से वह स्वयं भी परेशान नहीं रहता है बल्कि उत्साहित रहता है।
अनुशासित व्यक्ति का आभामंडल बहुत उज्जवल और चुम्बकीय होता है।
अनुशासन में रहना एक-दो दिन की बात नहीं है। यह एक गुण है जो लगातार प्रयोग में लाने से एक आदत बन जाती है। फिर यह बंधन बिल्कुल नहीं लगता विपरीत, इसका स्वरूप प्रबंधन हो जाता है।
#पिंकी परुथी ‘अनामिका’
परिचय: पिंकी परुथी ‘अनामिका’ राजस्थान राज्य के शहर बारां में रहती हैं। आपने उज्जैन से इलेक्ट्रिकल में बी.ई.की शिक्षा ली है। ४७ वर्षीय श्रीमति परुथी का जन्म स्थान उज्जैन ही है। गृहिणी हैं और गीत,गज़ल,भक्ति गीत सहित कविता,छंद,बाल कविता आदि लिखती हैं। आपकी रचनाएँ बारां और भोपाल में अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं। पिंकी परुथी ने १९९२ में विवाह के बाद दिल्ली में कुछ समय व्याख्याता के रुप में नौकरी भी की है। बचपन से ही कलात्मक रुचियां होने से कला,संगीत, नृत्य,नाटक तथा निबंध लेखन आदि स्पर्धाओं में भाग लेकर पुरस्कृत होती रही हैं। दोनों बच्चों के पढ़ाई के लिए बाहर जाने के बाद सालभर पहले एक मित्र के कहने पर लिखना शुरु किया था,जो जारी है। लगभग 100 से ज्यादा कविताएं लिखी हैं। आपकी रचनाओं में आध्यात्म,ईश्वर भक्ति,नारी शक्ति साहस,धनात्मक-दृष्टिकोण शामिल हैं। कभी-कभी आसपास के वातावरण, किसी की परेशानी,प्रकृति और त्योहारों को भी लेखनी से छूती हैं।