अतीत के पन्नों में झाँकती कहानियाँ

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कहानी-संग्रह – इंतज़ार ‘अतीत के पन्नों से’

लेखिका – मालती मिश्रा

प्रकाशन – समदर्शी प्रकाशन, भिवानी

पृष्ठ – 146

कीमत – 175/-

अतीत के पन्नों में झाँकते हुए मालती मिश्रा ने जिन कहानियों की रचना की है, उनका संकलन है “इंतज़ार अतीत के पन्नों से” । इस संकलन में तेरह कहानियाँ है, जो ज्यादातर सामाजिक ही हैं । प्रेम कहानियाँ भी हैं, लेकिन प्रेम की सहज स्वीकृति नहीं है । ज्यादातर पात्र माँ-बाप की मर्जी के ख़िलाफ़ जाकर विवाह करते हैं । माँ-बाप की मर्जी के ख़िलाफ़ जाकर विवाह करने का लड़कियों के जीवन पर प्रभाव दिखाना भी लेखिका का उद्देश्य रहा है । गलतफहमियों का प्रभाव भी दिखाया गया है और अतीत और वर्तमान की तुलना भी है ।

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पुस्तक का शीर्षक बनी कहानी “इंतज़ार का सिलसिला”, इस संग्रह की प्रथम कहानी है, जो शुरू में आभास देती है, कि इसमें भी पारम्परिक कहानियों की तरह बेटा अपने माँ-बाप को भूलकर शहर में अपना जीवन जी रहा है, लेकिन इसका अंत इसे उस श्रेणी से अलग करता है । ‘वापसी की ओर’ कहानी मुँह बोले भाई-बहन के प्रति समाज के नजरिये को दिखाती है । कहानी ‘ परिवर्तन’ में वर्तमान और अतीत के अंतर को पुलिस के जरिए दिखाया गया है । ‘दासता के भाव’ कहानी में दलितों पर ठाकुरों के प्रभाव को दिखाते हुए, इससे मुक्ति की राह दिखाई गई है । यह कहानी इस कथन का विस्तार है –

“आज के समय में भी शोषण हो रहा है तो शोषित वर्ग काफी हद तक स्वयं भी जिम्मेदार है शोषण का।” ( पृ. – 52 )

‘शराफत के नकाब’ कहानी में नायिका अपनी नौकरानी की बेटी को अपने ही पति की हवस का शिकार होने से बचाती है । वह अपने अतीत को भी याद करती है । इस कहानी में लेखिका ने औरतों को भी कटघरे में खड़ा किया है । ‘कसम’ कहानी में कसम की निरर्थकता का उल्लेख है । ‘अधूरी कहानी’ में शैला नामक पात्र मजबूरीवश नन्दिता मल्होत्रा बनकर रहती है, जबकि उसके बारे में सिद्धार्थ को अलग प्रकार की गलतफ़हमी है और अन्य लोगों को अलग प्रकार की । ‘मेरी दादी’ दादी-पौत्री के प्यार को दिखाती कहानी है ।

‘मीरा’ कहानी में मीरा और मुन्नी के आचरण और जीवन-शैली के उनके जीवन पर पड़े प्रभाव को रेखांकित किया गया है ।’फैसला’ पति-पत्नी के तकरार को लेकर लिखी गई है । तकरार के कारण का वर्णन है –

“जब तक विभोर के घरवाले नहीं होते तब तक नियति विभोर की अपनी पत्नी यानी अर्धांगिनी होती है, जब विभोर के परिवार से कोई आ जाता है तो वही नियति बाहरी इंसान बन कर रह जाती है ।” ( पृ. – 61 )

इस कहानी का अंत सुखद है । ‘गिला-शिकवा’ एक प्रेम कहानी है, जिसमें गलतफ़हमी के कारण प्रेमी दूर हो जाते हैं, लेकिन लेखिका ने इसे भी सुखान्त रखा है । ‘अपराध’ और ‘सन्दूक में बंद रिश्ते’ कहानियों में माँ-बाप की मर्जी के खिलाफ जाकर विवाह करवाने के कुप्रभावों को दिखाया गया है ।

कथानक रोचक हैं और इनकी प्रस्तुति के लिए लेखिका ने विभिन्न युक्तियों का प्रयोग किया है, जिनमें फ्लैशबैक तकनीक प्रमुख है । ‘परिवर्तन’ और ‘मीरा’ कहानी में तुलना का सहारा लिया गया है । ‘अधूरी कहानी’ में इसका प्रयोग इस प्रकार है –

” वैसे भी शहरों की अपेक्षा गाँवों में रात जल्दी होती है ।” ( पृ. – 130 )

गाँव-शहर की तुलना करते हुए लेखिका ने इस संग्रह में गाँव को श्रेष्ठ दिखाया है –

” गाँवों की यही तो ख़ासियत होती है सुख हो या दुःख, सबका साझा होता है ।” ( पृ. – 17 )

‘दासता के भाव’ कहानी में मैं पात्र की उपस्थिति है, जिससे आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग हुआ है । अन्य कहानियों में वर्णनात्मक शैली की प्रधानता है । ‘अपराध’ कहानी में सफ़र और कस्बे के विस्तार से वर्णन किया गया है । ‘सन्दूक में बंद रिश्ते’ कहानी में भाई के बहन की ससुराल आने के बाद बृजेश-पृथा के संबंधों में क्या बदलाव आया, यह नहीं दिखाया गया, इस दृष्टिकोण से कहानी कुछ अधूरापन लिये हुए है, हालाँकि यह कहानी रहीम के इस दोहे को व्याख्यित करने में सफल रही है –

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय

टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय ।

यह कहानी बहन के जीवन में भाई के महत्व को प्रतिपादित करती है –

” चाहे छोटा हो या बड़ा, परन्तु वह बहन का संबल होता है । बहन का अभिमान होता है ।” ( पृ. – 108 )

विवाहित लड़की के जीवन मे भाई और पिता का महत्त्व और बढ़ जाता है –

“जब एक स्त्री के सिर पर उसके पिता व भाई का हाथ हो तो उसके पति को भी उसके साथ ज्यादती करने से पहले परिणाम के विषय में सोचना अवश्य पड़ता है ।” ( पृ. – 109 )

लेखिका ने चरित्र चित्रण के लिए विभिन्न शैलियों को अपनाया है, लेकिन प्रमुखता वर्णन की ही है ।

” छुट्टी के दिन परिधि का समय स्टडी-रूम में, कुछ देर बाज़ार आदि घूमने, बाकी सुबह-शाम प्रकृति के सौंदर्य को अपने भीतर समेट लेने के प्रयास में,उसकी छटा निहारने में कटता ।” ( पृ. – 24 )

प्रथा के पति के बारे में कहा गया है –

” उसे पति के अधिकार तो सारे चाहिए पर कर्त्तव्य निभाने के नाम पर क्लेश करता ।” ( पृ. – 102 )

यह छवि एक पारम्परिक पति को रेखांकित करती है । वर्णनात्मक शैली बहुधा चित्रात्मक बन पड़ी है । कीर्ति साहनी के बारे में लेखिका लिखती है –

 

“पाँच फुट तीन इंच, हल्के हरे रंग की प्लेन साड़ी सिल्वर कलर का पतला-सा बॉर्डर और सिल्वर कलर की प्रिंटेड ब्लाउज, गले मे साड़ी के बॉर्डर से मेल खाती सिंगल लड़ी की मोतियों की माला, कानों में सिंगल मोती के टॉप्स, बालों को बड़े ही करीने से पीछे लेकर ढीला सा जूड़ा बनाया हुआ था, दाएँ हाथ में बड़े डायल की सिल्वर घड़ी और तर्जनी उँगली में पुखराज जड़ी अँगूठी, दूसरे हाथ में सिल्वर कलर का स्टोन जड़ा एक ही बड़ा कड़ा और अनामिका उँगली में डायमंड की अँगूठी तथा तर्जनी में सोने की एक दूसरी फैंसी अँगूठी । मेकअप के नाम पर होंठों पर हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक थी । गेहुआँ रंग तीखे नैन-नक्श, छरहरी काया कुल मिलाकर आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी वह ।” ( पृ. – 113 )

वार्तालाप और व्यवहार द्वारा भी चरित्रों को उद्घाटित किया गया है । कैलाश के बारे में जानने के लिए परिधि-कैलाश का वार्तालाप बड़ा सहयोगी है । मुन्नी का व्यवहार उसके चरित्र को बताता है ।

वातावरण चित्रण में लेखिका का मन खूब रमा है । सुबह, रात, कोहरे, अँधेरे आदि तमाम स्थितियों के चित्रण हैं ।

सुबह के बारे में लेखिका लिखती है –

” अरुण की लालिमा ने पूरब दिशा में पूरे आसमान को रक्तवर्णिम कर दिया है । पेड़ों पर चिड़ियों की चहचहाहट वातावरण को संगीतमय बना रही है । सूर्य की किरणों के समक्ष अँधेरे की शक्ति क्षीण होते-होते नष्ट हो रही थी, किन्तु अभी अंधकार पूर्णतया नष्ट नहीं हुआ था ।” (पृ. – 20 )

रात का वर्णन इस प्रकार है –

” रात की काली चादर ने प्रकृति के सौंदर्य को ढक लिया है, अब सुंदरता दिखाने की बारी आसमान की थी, जहाँ चन्द्रमा पतले से हसियाँ के आकार में अपनी सोने सी छटा बिखरा रहा था, किन्तु उसकी आभा केवल उसके आस-पास तक ही सीमित थी, वह पृथ्वी तक पहुँचने में असमर्थ थी । आकाश का विशाल थाल हीरे समान जगमगाते तारों के समूह से भरा हुआ था ।” ( पृ. – 31 )

खेतों का चित्रण है –

“पगडंडी के दोनों ओर हरियाली की दरी बिछी हुई थी कहीं गेहूँ के खेत कहीं चने के, कहीं मटर के तो कहीं गन्ने के खेत कहीं-कहीं तो सरसों के पीले-पीले फूल दूर-दूर तक अपनी मनोहारी छवि बिखेर रहे थे,जहाँ तक नज़र जाती सरसों के फूल ही नज़र आते ।” ( पृ. – 84 )

संवाद कम हैं, लेकिन जितने भी हैं छोटे और चुटीले हैं । ये कथानक को आगे बढ़ाने वाले भी हैं और चरित्र चित्रण में भी सहायक हैं । भाषा सरल और सरस है । पात्रानुकूल भाषा का प्रयोग होने के कारण यह सजीव बन पड़ी है ।

” तबही तो नौ साल तक ख़बर नाही लेहलू कि माँ मर गईल या ज़िंदा है ।” ( पृ. – 85 )

लेखिका ने अनेक सारगर्भित सूक्तियों का प्रयोग करके कहानियों की उपयोगिता को बढ़ाया है –

” मनुष्य किसी अन्य से नहीं, स्वयं अपने मन के भीतर बैठे डर से ही हारता है ।” ( पृ. – 58 )

” मनुष्य की सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएं तो जीने का लुत्फ़ ख़त्म हो जाए ।” ( पृ. – 80 )

” जब बातों की अधिकता होती है तो व्यक्ति शब्दहीन हो जाता है ।” ( पृ. – 86 )

संक्षेप में, कथानकों के चयन और प्रस्तुतिकरण दोनों में ही लेखिका सफल रही है । कहानियाँ रोचक हैं और पाठक को बांधे रखने में सफल हैं । इस सुंदर संग्रह के लिए लेखिका बधाई की पात्र है ।

#दिलबागसिंह विर्क

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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