इतनी बड़ी हवेली में,
इकली कैसे रहती मां।
बड़े-बड़े संकट को भी,
चुप कैसे सह लेती मां॥
कमर झुकी जर्जर काया,
फिर भी चल फिर लेती मां।
मुझको आता हुआ देख,
सेंक रोटियां देती माँ॥
खाँसी आती है मां को,
झट से मुँह ढक लेती मां।
मेरी नींद न खुल जाए,
मुँह पे हाथ रख लेती मां॥
जब उलझन में होती हूं,
चेहरा देख समझती मां।
पास बैठ कर चुपके,
सिर पे हाथ धर देती मां॥
भुनती है खुद बुखार में,
मेरा सिर दबाती मां।
गर्म तवे पर कपड़ा रख,
मेरी सेंकती छाती मां॥
मेरी भीगी पलकें देख,
पत्थर-सी बन जाती मां।
हाथ जोड़ प्रभु सम्मुख,
मेरी कुशल मनाती मां॥
कुछ नहीं मांगती मुझसे,
कैसे गुजारा करती मां।
जो भी घर में रखा होता,
सब मुझको दे देती माँ॥
किसी बात के न होने पर,
चुप होकर रह जाती मां।
अगले ही पल गले लगाकर,
सब कुछ भूल जाती है मां॥
#सुशीला जोशी
परिचय: नगरीय पब्लिक स्कूल में प्रशासनिक नौकरी करने वाली सुशीला जोशी का जन्म १९४१ में हुआ है। हिन्दी-अंग्रेजी में एमए के साथ ही आपने बीएड भी किया है। आप संगीत प्रभाकर (गायन, तबला, सहित सितार व कथक( प्रयाग संगीत समिति-इलाहाबाद) में भी निपुण हैं। लेखन में आप सभी विधाओं में बचपन से आज तक सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों का प्रकाशन सहित अप्रकाशित साहित्य में १५ पांडुलिपियां तैयार हैं। अन्य पुरस्कारों के साथ आपको उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान द्वारा ‘अज्ञेय’ पुरस्कार दिया गया है। आकाशवाणी (दिल्ली)से ध्वन्यात्मक नाटकों में ध्वनि प्रसारण और १९६९ तथा २०१० में नाटक में अभिनय,सितार व कथक की मंच प्रस्तुति दी है। अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षण और प्राचार्या भी रही हैं। आप मुज़फ्फरनगर में निवासी हैं|
Mon Sep 4 , 2017
पलभर की खुशियों से यहां क्यों मुस्कराना, पग-पग की कठिनाई को देख क्यों घबराना। बदलते रहते क्षण कहते हैं इसी को जिंदगी, चलें साहस से सदा मिले खुशियों का तराना। मंजिल दूर नहीं हौंसले ही कमजोर होते हैं, साहस से चलें,खुली राहें चहुं ओर होती हैं। देख कठिन राहों को […]