
हर बार ज़ख़्म सहा है
हर बार टूटा हूँ
अब होगा नहीं ऐतबार
अपनों से मैं रूठा हूँ
हर बार धोका खाया है मैंने
हर बार काँच सा फूटा हूँ
दिया है दर्द किसी ने
अपनों से बहुत पीछे छूटा हूँ
फिर भी कहूँ
नहीं करता इंतिज़ार अपनों का
तो समझना कि
मैं झूठा हूँ
हर बार ज़ख़्म सहा है
हर बार टूटा हूँ
#डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

