तुम परम दिव्य प्रभु जी,
तुमको है कोटि नमन
तुम निराकार परमेश्वर,
साकार भी बने स्वयम्॥
तेरा राम रूप अति सुन्दर,
श्री कृष्ण रूप नहीं कम ?
तेरा शिव रूप कल्याणक,
रुद्र रूप है परम प्रचन्ड ॥
शारदा लक्ष्मी तुम रूद्राणि,
तुम त्रिगुणा शक्ति अनन्त।
तुम रुक्मिणी सीता माता,
तुम हो जगधात्री धन्य ॥
तुम परम दिव्य हे प्रभु जी,
तुमको है कोटि नमन ॥
तुम शुद्ध भाव सज्जनों में
फूलों में तुम्हीं सुगंध ।
तुम्हीं गौरव गिरीवर के,
सागर की तू ही तरंग ॥
ग्रह तारक नक्षत्र जीव जग,
सचर अचर जड़ जंगम।
सब गतिमान हैं तुमसे,
हो उनमें उद्भासित तुम॥
ऋषियों ने असंख्य वर्षों,
तप कर पाए तेरे दर्शन।
तब ग्रंथ लिखे अद्भुत वे,
करते तव अनुपम वर्णन॥
तुम परम दिव्य हे प्रभु जी,
तुमको है कोटि नमन॥
#विजयकान्त द्विवेदी
परिचय : विजयकान्त द्विवेदी की जन्मतिथि ३१ मई १९५५ और जन्मस्थली बापू की कर्मभूमि चम्पारण (बिहार) है। मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के विजयकान्त जी की प्रारंभिक शिक्षा रामनगर(पश्चिम चम्पारण) में हुई है। तत्पश्चात स्नातक (बीए)बिहार विश्वविद्यालय से और हिन्दी साहित्य में एमए राजस्थान विवि से सेवा के दौरान ही किया। भारतीय वायुसेना से (एसएनसीओ) सेवानिवृत्ति के बाद नई मुम्बई में आपका स्थाई निवास है। किशोरावस्था से ही कविता रचना में अभिरुचि रही है। चम्पारण में तथा महाविद्यालयीन पत्रिका सहित अन्य पत्रिका में तब से ही रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। काव्य संग्रह ‘नए-पुराने राग’ दिल्ली से १९८४ में प्रकाशित हुआ है। राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष लगाव और संप्रति से स्वतंत्र लेखन है।
Wed Aug 2 , 2017
अंतस में होगा नहीं,जब तक ज्ञानालोक। बने रहेगें रात-दिन,जीवन में दुःख शोक॥ जितनी माला फेरिए, करिए मंत्रोच्चार। मन की पावनता बिना,यत्न सभी बेकार॥ अधरों पर हरि नाम है,मन में कटुता भाव। पार तरे कैसे कहो,भव सागर से नाव॥ धर्म पंथ की आड़ में,चलती मुहिम विशेष। धर्म नाम पर हो रहा,धर्म […]