
मर्ज कातिल हुआ,
दवा करते नहीं।
इश्क काबिल हुआ,
बयां करते नहीं।
इतनी भी दूरियां,
अच्छी नहीं हमदम।
मिलते हो ख्वाब में,
नजरें अता करते नहीं।
रफ्ता-रफ्ता,
उतर ही जाएगी।
मुश्किलें खुद
गुजर ही जाएंगी।
हौंसला तुम भी ‘विजय’,
बेवजह करते नहीं।
मिल के लिख लेंगे सनम,
नज्में जिंदगी की हम।
आंसूओं को अपनी,
क्यों,पनाह करते नहीं।
उसने रोका तो नहीं,
हम भी जिद्दी ठहरे।
इश्क क्या,इश्क किया,
हक अदा करते नहीं।
#विजयलक्ष्मी जांगिड़
परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़ जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।
Fri Jul 21 , 2017
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