चिंतन न कर हे मानव!

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himanshu mitra

परिदृश्य परिवर्तित हो गया इसका,

जिसकी अठखेलियों का

सम्मोहन कभी सूर्य की किरणों को
अल्पकालीन निद्रा में डुबा देता था।

जिसके आगमन पर चंद्र
भी बादलों का आवरण हटा देता था,
जिसका एहसास मात्र दोहरे शुष्क नयनों को नम कर देता था..
जिसका अवलोकन मात्र ही ह्रदय आघात को कम कर देता था।
निश्चित ही ये वही है,जिसकी गोद में बैठकर पक्षी कलरव करते थे।
जिसके सान्निध्य में  रहकर घुमक्कड़
मूर्तियों में रंग को भरते थे
जिसके एक सूक्ष्म दृश्य से चौपालों का
शून्यकाल संतृप्ति में आ जाता था।

उसके आते ही मौसम का रुप
परिवर्तित हो जाता था,
पर शायद उसमें अब  वो बात नहीं,
दिन तो ढलता है पर उसके आगे चाँदनी रात नहीं,
निर्रथक समय संयोजित हो जाता है..
मौसम का रंग भी परिवर्तित हो जाता है।

पर चौपालों का शून्यचक्र नहीं बढ़ता,
ये पवन भी शाखों का रुप नहीं  गढ़ता..

चिंतन न कर हे मानव!
ये तेरी ही परिकल्पनाओं का परिणाम है,
गति देना चाहता था तू जिस जीवन को

आज उस पर ही अल्पविराम है।
समय शेष है अब भी तू अपनी
नगण्य चेष्टाओं को संकुचित कर ले,
बर्हिगमन कर स्वार्थ का अपनी
शिराओं से प्रकृति प्रेम के रक्त को भर ले॥

                                                  #हिमांशु मित्रा

परिचय: हिमांशु मित्रा उत्तरप्रदेश राज्य के शिवपुरी (लखीमपुर खीरी) में रहते हैंl आपकी उम्र २० वर्ष तथा स्नातक उत्तीर्ण हैंl आप हिन्दी में लिखने का शौक रखते हैंl  

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