जीवण जोबन अंत


. (ढूँढाड़ी दोहा छंद)
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पीव कनागत भी गया, दौरा लागै काग।
यादाँ थारी आवती, हिवड़ै सुल़गै आग।।
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थाँकी सौगन सायबा,याद करूँ वै बात।
तारा गिणती काटती, विरहा सारी रात।।
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दिन भर काग उडावताँ,सगुन मनाऊँ कंत।
चढूँ डागलै देख री, आताँ जाता पंत।।
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प्रेम फाँस हिवड़ै लगी, तपै सुनहली देह।
देख बादलाँ मेह रा, तन मन चावै नेह।।
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उड़ताँ पंछी आसमां, करती देख विचार।
पाँख उगा भगवान तूँ, उड़ूँ समंदर पार।।
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मन मैं भावै सायबा, धंधै लगै न जीव।
हिचकी आती जद रुकै,सोचूँ आतम पीव।।
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नवराताँ मैं सब जणी, पूजै देवी देव।
रही ऐकली सायबा,थाँ बिन कयाँ कलेव।।
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होय देवराँ आरती, मन मैं उठरी हूक।
अब तो आजा सायबा,नवराताँ मत चूक।।
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घर आँगण सूनो लगै, खाबा आवै नीम।
बिन थाँकै काया बल़ै,आजा बलम हकीम।।
. ✨✨✨✨✨
नवराताँ नी आय तो, जीवूँ कोनी कंत।
तड़प तड़प कर मैं करूँ,जीवण जोबन अंत।
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शरमा बाबू लाल इब, समझ विरह री पीर।
सारस ज्यूँ कुरल़ाय री,आन बँधा मन धीर।।

नाम–बाबू लाल शर्मा 
साहित्यिक उपनाम- बौहरा
जन्म स्थान – सिकन्दरा, दौसा(राज.)
वर्तमान पता- सिकन्दरा, दौसा (राज.)
राज्य- राजस्थान
शिक्षा-M.A, B.ED.
कार्यक्षेत्र- व.अध्यापक,राजकीय सेवा
सामाजिक क्षेत्र- बेटी बचाओ ..बेटी पढाओ अभियान,सामाजिक सुधार
लेखन विधा -कविता, कहानी,उपन्यास,दोहे
सम्मान-शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र मे पुरस्कृत
अन्य उपलब्धियाँ- स्वैच्छिक.. बेटी बचाओ.. बेटी पढाओ अभियान
लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः 10

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