मोदी से जनता या नेता परेशान!

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hemendra

         बीते पांच बरसों से देश में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के दायित्व पर काबिज हैं लेकिन जितना हो-हो हल्ला गत एक-दो माह से हो रहा है इतना कभी नहीं हुआ। क्यां इससे ये समझे कि बाकी समय में नरेन्द्र मोदी अच्छे प्रधानमंत्री थे जो अब बेकार साबित हो रहे है। माहौल से तो येही अंदेशा लगाया जा सकता है। तभी तो चंहुओर नेतागिरी की जमात में मोदी हटाओं, देश बचाओं और हमें बनाओं का नारा गूंज रहा है। हर कोई अनचाहा  गठबंधन, बेमोल दोस्ती और सत्ता लोलुपत्ता का पाठ पढ़ रहा है। सबक का सबब इतना ही असरकारक था तो इनकी गलबगियां ने पहले ही क्यों गुल नहीं खिलाया।
आखिर! अब ऐसा क्यों हो रहा है जो पहले नहीं हुआ। मोदी इतने ही बूरे थे तो इन्होंने समय रहते हुंकार क्यों नहीं भरी, तब क्यों चुप रहे, ये अबूझ पहेली समझ के परे है? आज चिल्ला रहे जब लोकसभा चुनाव सर पर है। रहनुमाई बेगानी शादी में अब्दुला दीवाना के तर्ज पर रेलमपेल रैली में बेसुरा राग अलापने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मतलब, जनता की आड़ में कुर्सी की होड़ मची हुई है। भागमभागी में जनता की भलाई के बहाने सत्ता की मलाई ढूडऩे की कवायद जोरों पर है। रवायत में कि चाहे कुछ भी हो जाए सत्ता की कुंजी हमारे पास रहना चाहिए ताकि समय रहते अपना रौंब झाड़ सके।
ये आगामी वक्त ही बताएंगा की किसे सजा और किसे मजा मिलती है फैसला तो जनता को करना है फिर क्यों नेताओं में नाहक ही हायतौबा मची हुई है। यदि नरेन्द्र मोदी ने देश से वादा खिलाफी की है तो घबराइये ना मोदी को देश जरूर सबक सिखा देंगा क्योंकि देशवासी देना भी जानते और लेना भी। इतर, अपनी सिसायत के वास्ते जमीन तलाशते कूपमंडूकों की बारात फिजा में खलल ना डाले तो बेहतर होगा। जनादेश की इतनी भूख कभी दिखाई नहीं दी जो आज दे रही है। उधेड़बून में सरकार बनाने की पराकाष्ठा इतनी ना बढ़ जाएं कि संवैधानिक पद में बैठा व्यक्ति अछूत कहलाने लगे जैसे पूर्व के चुनावी दौर में उनके खिलाफ दिए गए व्यंग्य बाण आज भी शर्मसार  है।
गौरतलब रहे कि जनता अपना बला भूरा अच्छे से जानती है, इसमें फूकट की टांग अड़ा अपना उल्लू सीधा करने के अलावे और कुछ नहीं है। बेबस मोदी से जनता या नेता परेशान है! अनसुलझा प्रश्न जिंदा है। लिहाजा, लगने लगा है कि मोदी जी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनसे जनता नहीं नेता परेशान है। अलबत्ता सोते-जागते मोदी-मोदी का मंत्रोचार रूके नहीं रूका रहा है। जैसे मोदी हट जाएंगे तो देश का अपने आप कल्याण हो जाएंगा। फिर मोदी के बिना आजादी के इतने सालों बाद भी इन आह्लादितों की स्वयं और समर्थन की सरकारों ने देश को मूलभूत समस्याओं से क्यों वंचित रखा। जवाब इन्हें भी देना चाहिए तब मामला बराबरी का कहलाएंगा वरना सब बनाम मोदी की भेट चढ़ जाएंगा।
बदस्तुर तेरे-मेरे के फेर में राजनैतिक कूटनीति देश में बढ़ती ही जा रही है। बेलगाम सिलसिला शुचिता और स्वछंदता के परे राष्ट्रनीति को रसातल में ले जाना का मार्ग प्रशस्त करती है और कुछ नहीं। राजकाज में विरोध होना लाजमी है पर बुरे कामों का, केवल एक ही दल और नेता का नहीं। लोकतंत्र में एक व्यक्ति के आने-जाने से इतना परहेज करना कहां तक ठीक है मुझे नहीें मालूम। परेशानी जनता के दर्द के मर्ज के लिए होती तो सब साथ खड़े होते आलम अपनी ढपली, अपना राग का है इसीलिए दूर से बांय-बांय हो रही है। मसलन गाहे-बगाहे मंंजिल साफ दिखती है अब की बार हमारी सरकार! यानि हालातों के मुताबिक मोदी से जनता नहीं बल्कि तखत के खातिर नेता परेशान है! बतौर सब थाली के चट्ठे-बट्ठे एक होकर जिंदाबाद-जिंदाबाद का राग अलापकर हम से अच्छा कौन की दुहाई दे रहे है।
   # हेमेन्द्र क्षीरसागर

matruadmin

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।