नवरात्रि का आया प्यारा पावन त्यौहार,
आओ पूजे माँ के नो रूपो को बारंबार,
माँ दुर्गे को जिस द्वितीय रूप पूजा जाता है,
वो रूप माँ का ब्रह्मचारिणी कहलाता है,
सर्वव्याप्त है,सर्वश्रेष्ठ है,ना आदि और ना अंत है,
माता रानी को कोई भी किसी सीमा में बांध ना पाया,
इसलिए मेरी माँ का नाम ब्रह्मचारिणी कहलाया।
दाहिने हाथ मे जप की माला है प्यारी,
बाए हाथ सुंदर कमण्डल को धारे,इनको
धारण करने की अजब कहानी,नारद जी
ने भगवान शिव को पाने की जब दिशा
माँ को तपस्या करने की दिखाई,
खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।
कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।
आओ माँ के जीवन से हम सब ये सीखे
कितनी भी जीवन मे कठिनाई आ जाये,
पर मन विचलित ना कर हम उन सबसे
निरंतर तत्प्रता से लड़कर मंजिल को पाए।
द्वितीय नवरात्रि पर आओ सब इनको मिलकर पूजे भाई,
#नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश )