भगत सिंह नाम है मेरा 

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nilima mishra
वो गोली आज तक  छलनी है करती जानों
दिल अपने ,
है जलियाँबाग का मातम मेरी आँखों में
बचपन से ।
भगत सिंह नाम है मेरा मैं फ़ौलादी हूँ तन
मन  से,
मेरा चोला बसंती  रंग दिया है माँ ने
बचपन से ।
क़सम खाता हूँ मैं अपनी हर इक आज़ाद
धड़कन से ,
निभाऊँगा मैं पूरा फ़र्ज़ मिट्टी के हर एक
कण से ।
सितम की इन्तहा भी कर ले तू ऐ जान
दुश्मन  के ,
यही है ख्वाब मेरा मुल्क हो आज़ाद
दुश्मन  से ।
जवानी काम आ जाये वतन की शान की
ख़ातिर ,
रगों में दौड़ता है खून हर पल बस इसी
धुन में ।
मेरे साथी है बटुकेश्वर ,जतिन ,आज़ाद और
सुखदेव ,
सभी का एक है रस्ता सभी बाँधे कफ़न सर
 पे ।
वो लाला जी पे करना जुर्म न बर्दाश्त
हमको था ,
मिली सांडर्स को इसकी सजा लाहौर  के
पथ में ।
वो बम फेंका था जब संसद में हम तो भाग
सकते थे ,
मगर हम पीठ पर कब वार करते अपने
दुश्मन के ।
मुझे साम्राज्यवादी ताक़तों को बस
कुचलना है ,
हो ज़िंदाबाद का नारा बुलंदी पर जमीं
नभ में   ।
न रोना एक भी आँसू शहीदों की मज़ारों
पर ,
चढ़ाना फूल उन पर  अपने केवल ह्रदय
उपवन के ।
अभी भी मुल्क में बाक़ी हैं कितने  काम
करने हैं ।
बचा कर लाज रखो शान झंडे की नये
युग में ।
#डा० नीलिमा मिश्रा

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

29 अप्रैल, 1989 को मध्य प्रदेश के सेंधवा में पिता श्री सुरेश जैन व माता श्रीमती शोभा जैन के घर अर्पण का जन्म हुआ। उनकी एक छोटी बहन नेहल हैं। अर्पण जैन मध्यप्रदेश के धार जिले की तहसील कुक्षी में पले-बढ़े। आरंभिक शिक्षा कुक्षी के वर्धमान जैन हाईस्कूल और शा. बा. उ. मा. विद्यालय कुक्षी में हासिल की, तथा इंदौर में जाकर राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अंतर्गत एसएटीएम महाविद्यालय से संगणक विज्ञान (कम्प्यूटर साइंस) में बेचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कंप्यूटर साइंस) में स्नातक की पढ़ाई के साथ ही 11 जनवरी, 2010 को ‘सेन्स टेक्नोलॉजीस की शुरुआत की। अर्पण ने फ़ॉरेन ट्रेड में एमबीए किया तथा एम.जे. की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने सॉफ़्टवेयर के व्यापार के साथ ही ख़बर हलचल वेब मीडिया की स्थापना की। वर्ष 2015 में शिखा जैन जी से उनका विवाह हुआ। वे मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और हिन्दी ग्राम के संस्थापक भी हैं। डॉ. अर्पण जैन ने 11 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण वर्ल्ड बुक ऑफ़ रिकॉर्डस, लन्दन द्वारा विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया।