यह सच है कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं पद है । गुरु वह है जिसके पीछे अगर ‘अ’( शून्य, रिक्त, अभाव, नहीं,आदि) भी लग जाए तो गौरव हो जाता है ।( गुरु+अ =गौरव)
# लेकिन इसके लिए शून्यता के बोध से गुरु के पीछे चलना पड़ता है ,आगे नहीं ।
अगर गुरु के आगे लगने की कोशिश की तो अगुरु हो जाएगा, आकर्षण शून्य हो जाएगा, वजन नहीं रह जाएगा ।
# तो, हिंदी भाषा यह भी सिखाती है कि हमें गुरु के पीछे चलना चाहिए । अगर एक और व्युत्पत्ति ‘ग्र’ ध्वनि से गुरु को देखें तो भी यही अर्थ आता है। ग्र ध्वनि से ही गुरु बनता है, ग्रह, ग्रहण बनता है । इन सबमें खींचने या आकृष्ट करने का भाव स्पष्ट है।
# तो, गुरु अपनी ओर खींचता भी है । हाँ, उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में जाना तो शिष्य को ही पड़ेगा, तभी गुरु अपना काम करेंगे । लेकिन ऐसा भी सब नहीं कर सकते क्योंकि अज्ञानता का बोध होने के लिए ज्ञान की कुछ सीढ़ी चढ़ना जरूरी है। जो, इसको उपलब्ध नहीं होते, उन्हें गुरु की प्यास ही नहीं होती ।
# गुरु का एक और अर्थ अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला तो आप सब जानते ही हैं । (गु अन्धकार , रु प्रकाश) ।
# गुरु पूर्णिमा के दिन अपने सभी गुरुओं को प्रणाम करता हूँ। और, सबसे पहले उस परम गुरु को विशेष प्रणाम, जो मुझसे होकर मेरे शब्दों में उतर जाता है ;और जो सभी पाठकों के अंतस्थल में बैठ इन शब्दों की ओर उनका ध्यान आकृष्ट करता है ।
श्री गुरुवे नमः !
(मातृभाषा उन्नयन संस्थान की तरफ से आप सभी को गुरुपूर्णिमा की अशेष शुभकामनाएँ !)
#कमलेश कमल