श्रध्दा और संस्कार बड़ो के प्रति 

sanjay
दोस्तों वैसे तो कलियुग में संस्कार और श्रध्दा की बात करना बहुत ही अजीब सा लगता है न ? परन्तु कलयुग में भी लक्ष्मण और भरत जैसा भाई हो सकते है / यदि उन्हें परिवार के बड़े बूढ़ो ने सही परवरिश के साथ बच्चो में संस्कार और पढाई लिखे का ज्ञान आदि सही तरीके से दिया हो तो बच्चे कभी भी अपने मार्ग से कभी भी नहीं भटकेंगे / काल चक्र भी कभी कभी हँसते खिल खिलाते परिवारों में कोई इस तरह की घटना घाटकर पूरे के पूरे परिवार को एकाएक बहुत ही परेशानियों में डाला देता है, और उस समय फिर जीवन की परीक्षा शुरू होती है / यदि इस समय इंसान अपने धैर्य और विवेक के साथ मेहनत और ईमानदारी को बरकरार रखते हुए अपना कार्य करता है ,तो वो हर मुसीबत से बहार निकल आता है / तभी तो लोग कहते है की समय हर किसी का सदा एक सा नहीं होता, कभी न कभी तो समय बदल कर आएगा / इसी उम्मीद के सहारे हर सांसारिक प्राणी अपना कर्म करता है / अपने तथ्य को समझने के लिए एक छोटा सा उदाहरण दे रहा हूँ / एक छोटा सा परिवार था उसमे माँ, पिता और दो भाई थे / बेटी की चाहात में बड़े बेटे और छोटे में १५ साल का अंतर था / बहुत ही हंसी ख़ुशी और स्नेह प्यार के साथ परिवार में खुशाली थी / जब छोटा बेटा करीब सात साल का था, तभी एक दुर्घटना में मात पिता का देहांत हो गया / जिसके कारण पूरे परिवार में संकट के बदल उमड़ पड़े / बड़ा बेटा जो की करीब २२ साल का था / उसके ऊपर एक दम से छोटे भाई की जिम्मेदारी आ गई / बड़े भाई ने अपनी पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर एक क्लर्क की नौकरी कर ली / भाई की देख-रेख ठीक से हो जाये ,इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली / समय धीरे धीरे से चलता गया बड़े भाई ने अपनी पत्नी से एक दिन कहाँ की जब तक छोटे की पढ़ाई लिखे पूरी नहीं होती तब तक हम अपनी संतान पैदा नहीं करेंगे / उसकी पत्नी ने भी अपने पति की बात को समझते हुए अपनी सहमति दे दी / क्योकि तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और भाई की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा। छोटे की पढ़ाई पूरी होते ही उसे एक अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब बड़े भाई के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा। दोनों ही भाई में अटूट प्यार और एक दूसरे के प्रति बहुत आदर भाव था, की एक दिन उसने अपने बड़े भैया, को फोन किया की परसों नये मकान पे हवन है और छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।” छोटे भाई ने बड़े भाई बोला।
बड़े भाई ने पूछा क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?” नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं । अपना मकान”, भरपूर आश्चर्य के साथ बड़े भाई के मुँह से निकला। छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।” ” बस भैया “, कहते हुए छोटे ने फोन काट दिया। ” अपना मकान” , ” बस भैया ” ये शब्द बड़े के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज ने लगा । सोचने लगा की नया मकान ? दिमाग में परेशानी का कारण बन रही थी तभी पत्नी ने देखा की ये कुछ परेशान से है तो पूछा क्या हुआ ? तब अपनी अपनी बीबी को बताया, तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, ” देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया ? कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।
इतवार की सुबह छोटे भाई ने भाई साहब और भाभी तथा बच्चो को लेने गाड़ी,भेज दी और जब वह एक सुन्दर से मकान के आगे कर खड़ी हो गयी। तब मकान को देखकर बड़े के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर बड़े भाई ने मन ही मन कहा, ” देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।”
मकान देखते समय बड़े की आँखों में आँसू थे, जिन्हें उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका। की कही छोटे भाई को समझा न आ जाये की में दुखी हो रहा हूँ और रो रहा हूँ / तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, “हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।”
छोटे के दोस्तों ने कहा, “पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।” यह सुन छोटा भाई बोला की ” इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत ही हूँ / इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।” हवन कुण्ड के सामने बैठते समय छोटे ने बड़े भाई के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ” भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।”
पूरे हवन के दौरान बड़ा भाई अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था । वो ख़ुशी से अपने आप को रो ही नहीं प् रहा था की मेरा भाई मुझे इतना कुछ दे सकता है / वो भी इस कलयुग में , क्योकि दोस्तों आज के युग में भरत जैसे भाई बहुत आज भी
मिल जाते हैं परन्तु लक्ष्मण जैसे बिरले ही मिलते है / ये सब तभी सम्भव हुआ क्योकि परिवार के बड़े बूढोने अपनी औलाद को अच्छी और सही संस्कार दिए / तभी तो छोटे बही के मन में अपने भैया और भाभी के प्रति उनके द्वारा किये गए बलिदान को सदा याद रखा और अपने माता पिता जैसे भाई के प्रति सच्ची श्रध्दा सदा ही समर्पित भाव बनाये रखा /
साथियो चाहे कलयुग हो या सत युग हो यदि पारिवारिक संस्कार अच्छे अपनी औलाद को दिए तो वो सदा ही अपने परिजनों के प्रति समर्पित भाव रखेगा /

#संजय जैन

परिचय : संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं पर रहने वाले बीना (मध्यप्रदेश) के ही हैं। करीब 24 वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।ये अपनी लेखनी का जौहर कई मंचों  पर भी दिखा चुके हैं। इसी प्रतिभा से  कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इन्हें  सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के नवभारत टाईम्स में ब्लॉग भी लिखते हैं। मास्टर ऑफ़ कॉमर्स की  शैक्षणिक योग्यता रखने वाले संजय जैन कॊ लेख,कविताएं और गीत आदि लिखने का बहुत शौक है,जबकि लिखने-पढ़ने के ज़रिए सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा सक्रिय रहते हैं।

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