पानी को बांधा तो सरोवर बन गया,
मोतीयों को बाँधा तो गले का हार
बिना व्रतों का जीवन अंगार बन गया
व्रतों से बंधा जीवन अलंकार*
आम जन जीवन और दिनचर्या में भी यही बात लागू होती है कि कुछ व्रतों से यदि हम अपने जीवन को बाँध ले तो यकिन मानें, जीवन में सुख की वृद्धि और समृद्धि के साथ खुशहाली आ जाएगी, किन्तु वर्तमान समय में व्रतों से तात्पर्य धार्मिक नियमों से होने लगा है, जबकि आपा-धापी की दिनचर्या में हम खुद से, परिवार से, पत्नी या बच्चों से मिलना ही भूल चुके है|
यह युग इंटरनेट युग है जिसमें शरीर में होने वाले रोगों में सर्वाधिक अनुपात दिनचर्याजन्य रोगों का है| इस पर नकेल कसने की सख्त आवश्यकता है|
दैनिक जीवन दिनचर्या में हम आभासी दुनिया में तो खूब सामाजिक है,किन्तु वास्तविक दुनिया में हम उतने ही अकेले हो रहेे हैं|
यही अकेलापन कई रोगों का कारक है जैसे मानसिक तनाव, उच्च या निम्न रक्तचाप, हायपरटेंशन, सिर दर्द, आधा शीशी का दर्द, मोटापा, अवसाद ग्रस्त होने से आत्महत्या जैसे तत्व जीवन में प्रवेश करने लग जाते है|
इन सब रोगो के मूल में जाने पर एक ही जड़ नज़र आती है वो है *’इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग’* या कहें सोशल मीडिया पर आवश्यकता से अधिक समय व्यतित करना |
सच ही तो है, हम पहले के जमाने में बिस्तर से उठने से पहले ‘कर’ दर्शन करते थे,और मंत्र पढ़ते थे और दिवस का आरंभ करते थे, परन्तु आज के समय में हम मोबाईल उठाते है, व्हाट्सअप या फेसबुक दर्शन पहले करते है|
आभासी दुनिया को हमने अपनी दिनचर्या का प्रथम हिस्सा बना लिया है|
और इसी के अत्यधिक प्रयोगों से घिरने के बाद हमने रोगो को आमंत्रण दे रखा है, और यही निमंत्रण व्यक्ति को घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार, भाई-बंधु, माँ-बाप, पत्नी-बच्चें सबको सबसे दूर करके अवसाद को पास बैठा लिया है|
इसी सार्वभौमिक समस्या का सार्थक समाधान निकालने के लिए सबसे पहले सोशल मीडिया का दिनचर्या में नियंत्रण होना आवश्यक की नहीं बल्कि अनिवार्य है|
एक सार्थक नियम के तौर पर 60-60-30 का नियम हमें दिनचर्या बनाना होगा जिसमें सबसे पहले सुबह जब हम बिस्तर छोड़े उसके बाद के 60 मिनट में सोशल मीडिया का उपयोग न करके, केवल वो समय स्वयं पर खर्च करें, जैसे दैनिक कार्य, योग, प्राणायाम, घूमना, व्यायामशाला (जिम) में समय व्यतित करें| अपने दिन की तैयारी करें पर इस दौरान सोशल मीडिया को उपयोग न करें|
दूसरा, जब दफ्तर या दुकान से शाम को घर लौटे तब फिर 60 मिनट केवल परिवार, बच्चों और घर को समय दे| इस समय भी सोशल मीडिया को दैनंदिनी से दूर रख कर यह भी समय मानसिक रुप से स्वस्थ रहें| जब यह समय आप परिवार को देंगे तो जो विवाद परिवार के बीच में समय न दे पाने के कारण होते है वह भी नहीं होंगे|
इसी तरह जब आप सोने जाए उससे पहले के 30 मिनट सोशल मीडिया पर सक्रिय न रह कर वो समय अगले दिन की मानसिक तैयारी में लगाएं, क्योंकि अवचेतन मन इस समय सर्वाधिक सक्रिय रहता है, और इस समय यदि अवचेतन मन में सक्रिय निर्देश पहुँचे तो सफलता भी सुनिश्चित होती है साथ ही इससे नींद न आने की समस्या भी नहीं होगी| नींद का कायदा है, जब उसमें किसी भी तरह का खलल या बाधा आती है तो नींद आने से चुक जाती है, और फिर नींद न आने से कई बीमारियाँ घर कर जाती है|
इस तरह सुबह के 60 मिनट, शाम में घर लौटने के बाद के 60 मिनट और सोने से पहले के मात्र 30 मिनट यदि सोशल मीडिया से दूरी रख कर हम अपनी आम दिनचर्या को ख़ास बना लेंगे|
तो ख्याल रखे अपना, सोशल मीडिया का भी दिनचर्या में नियंत्रण होगा और स्वास्थ्यगत समस्याओं के साथ मानसिक अवसाद भी दूर रहेगा|
खुश रहें, मस्त रहें, जीवन का आनंद ले….
शुभम् अस्तु…
#डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’
परिचय : डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।