चन्दा मामा

sunil chourasiya
तारों की बरात लेकर
आ गए चन्दा मामा।
दूल्हा बनकर दुनिया में
छा गए चन्दा मामा॥
चन्दा मामा निकल पड़े हैं
मामी की तलाश में।
दर-दर भटक रहे हैं देखो
बादल संग आकाश में॥
प्यारे-प्यारे सारे तारे
भूल गए हैं रास्ता।
भटक गए हैं,लटक गए हैं
कैसे करेंगे नाश्ता॥
निशा-रानी मामी को
भा गए चन्दा मामा।
तारों की बरात लेकर
आ गए चन्दा मामा।
दूल्हा बनकर दुनिया में
छा गए चन्दा मामा॥
मामी की मुस्कान पर
मामा मोहित हो गए।
स्वच्छ चांदनी ओढ़कर
मामा वहीं सो गए॥
सारे तारे अपलक
देखते रहे जग-लीला।
‘सावन’ तुहिन कण से
हो गया जग गीला॥
खुशियों की बारिश हुई
नहा गए चन्दा मामा।
तारों की बरात लेकर
आ गए चन्दा मामा।
दूल्हा बनकर दुनिया में
छा गये चन्दा मामा॥
तरु पर खग-कुल गा रहा
झूमकर मंगल गीत।
बच्चे पत्ते ताली बजाते,
सरिता से सुनो संगीत।
शरमाकर मामी छिप गईं
देखकर भास्कर भसुर को।
पूर्वांचल में खिला कमल
देख स्वर्णिम अरुण ससुर को॥
‘सावन’! होते ही नैना चार
गुनगुना गए चन्दा मामा।
तारों की बरात लेकर
आ गए चन्दा मामा।
दूल्हा बनकर दुनिया में
छा गए चन्दा मामा॥

               #सुनील चौरसिया ‘सावन’

परिचय : सुनील चौरसिया ‘सावन’ की जन्मतिथि-५ अगस्त १९९३ और जन्म स्थान-ग्राम अमवा बाजार(जिला-कुशी नगर, उप्र)है। वर्तमान में आप काशीवासी हैं। कुशी नगर में हाईस्कूल तक की शिक्षा लेकर  बी.ए.,एम.ए.(हिन्दी) सहित बीएड भी किया हुआ है। इसके अलावा डिप्लोमा इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन,एनसीसी, स्काउट गाइड, एनएसएस आदि भी आपके नाम है। आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन,लेखन,गायन एवं मंचीय काव्यपाठ है तो सामाजिक क्षेत्र में नर सेवा नारायण सेवा की दृष्टि से यथा सामर्थ्य समाजसेवा में सक्रिय हैं। विधा-कविता,कहानी,लघुकथा,गीत, संस्मरण, डायरी और निबन्ध आदि है। अन्य उपलब्धियों में स्वर्ण-रजत पदक विजेता हैं तो राष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन एवं विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बैनर तले मॉरीशस, इंग्लैंड,दुबई,ओमान और आस्ट्रेलिया आदि सोलह देशों के साहित्यकारों एवं सम्माननीय विदूषियों-विद्वानों के साथ काव्यपाठ एवं विचार विमर्श शामिल है। मासिक पत्रिका के उप-सम्पादक भी हैं। लेखन का उद्देश्य ज्ञान की गंगा बहाते हुए मुरझाए हुए जीवन को कुसुम-सा खिलाना, सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार कर सकारात्मक सोच को पल्लवित-पुष्पित करना,स्वान्त:सुखाय एवं लोक कल्याण करना है। श्री चौरसिया की रचनाएँ कई समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

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