योग प्रकृति,शरीर विज्ञान(स्थूल और सूक्ष्म शरीर)और आध्यात्मिक तथ्यों का सम्मिश्रण है।योग शब्द अर्थात मेल या जुड़ना,वैसे भी देखा जाए तो विभिन्न लाभकारी क्रियाओं का संयोग योग में है।योग शब्द से ही योगी शब्द की व्युत्पत्ति हुई,जिसका अर्थ होता है महान तपस्वी, जिसने इंंद्रियों और मन पर विजय प्राप्त कर ली हो।वैसे भी मन और इंद्रियों को साधते ही सब काम सध जाते है।
योग की व्याख्या बहुत विस्तीर्ण है और यह बहुत ही गूढ़ विषय भी है।इस विषय में जितना पढ़ो कम है।
हमारे आराध्य शिवजी के अनुसार-
विविच्य सर्वशास्त्राणि,विचार्यच पुनः पुनः।
इदमेकं सुनिष्पन्नं योगशास्त्र परमतमन।
अर्थात-मैने समस्त शास्त्रों की विवेचना कर उन शास्त्रों का पुनः पुनः विचार किया और इस निश्चय पर पहुंचा कि योगशास्त्र ही सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है।
अगर योग को जीवन में आत्मसात कर लिया जाए तो इससे बढ़कर कोई उपलब्धि नहीं, क्योंकि योगी व्यक्ति मन से और तन से दोनो से बलिष्ठ होता है।
वैसे भी कहा गया है कि-
व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बल सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थ साधनम्।।
अर्थात व्यायाम से स्वास्थ्य, लंबी आयु,बल और सुख की प्राप्ति होती है।निरोगी होना परम सौभाग्य है,इससे आपके सभी कार्य सिद्ध होते है।
योग करने से मानसिक तनाव दूर होता है।एकाग्रता बढ़ती है,चित्त शांत होता है,क्रोध, उद्विग्नता इत्यादि विकारों पर सहज नियंत्रण होता है।शारीरिक बल बढ़ता है,विपरीत परिस्थितियों में रहने की क्षमता बढ़ती है।आप हर तरह की परिस्थितियों के अनुकूल रहने योग्य हो जाते है।शरीर में लचीलापन आता है।प्राणायाम से शरीर के सूक्ष्म तंतुओं में प्राणवायु पहुँचती है तो अलग ही ऊर्जा का अनुभव होता है।
बड़े असाध्य रोग योग से ठीक होते देखे गए है,जिनमें कर्करोग भी सम्मिलित है।योग तंत्रिका तंत्र और अंतःस्रावी ग्रंथियों में संतुलन उत्पन्न करता है।इस तरह योग व्यक्ति के सभी पहलुओं पर काम करता है।अधोगामी प्रवृत्तियों से दूर रहते हुए मनुष्य स्वतः ही ऊर्ध्वगामी पथ पर अग्रसर होता है।
#कविता नागर