त्योहार और बाजार…!!

tarkesh ojha

कहते हैं बाजार में वो ताकत है,जिसकी दूरदर्शी आंखें हर अवसर को भुनाकर मोटा मुनाफा कमाने में सक्षम हैं। महंगे निजी स्कूल,क्रिकेट,शीतल पेयजल व मॉल से लेकर फ्लैट संस्कृति तक इसी बाजार की उपज है। बाजार ने इनकी उपयोगिता व संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया और नियोजित तरीके से इस क्षेत्र में आहिस्ता-आहिस्ता अपना आधिपत्य स्थापित भी कर ही लिया है। कई साल पहले जब बोतलबंद पानी का दौर शुरू हुआ तो मन में सहज ही सवाल उठता…क्या जमाना आ गया है,अब बोतलों में पानी बिकने लगा है,लेकिन आज हम सफर के लिए ट्रेन पकड़ने से पहले ही बोतलबंद पानी खरीद कर बैग में रख लेते हैं। कई दशक पहले ही बाजार ने त्योहार को भी अवसर के रूप में भुनाना शुरू कर दिया। त्योहार यानी बड़ा बाजार,पहले जेबें खाली होते हुए भी त्योहार मन को असीम खुशी देते थे। त्योहार के दौरान दुनिया बदली-बदली सी नजर आती थी,लेकिन दुनियावी चिंताओं के फेर में धीरे-धीरे मन में त्योहारों के प्रति अजीब-सी उदासीनता घर करने लगी। मन में सवाल उठता…यह तो चार दिन की चांदनी है…। जब दिल में खुशी है ही नहीं,तो दिखावे के लिए खुश दिखने का मतलब। फिर त्योहारों में भी अजीब विरोधाभासी तस्वीरें नजर आने लगती। त्योहार यानी एक वर्ग के लिए मोटे वेतन के साथ अग्रिम और बोनस के तौर पर मोटी रकम के प्रबंध के साथ लंबी छुट्टियां की सौगात। फिर पर्यटन केन्द्रों में क्यों न उमड़े भीड़। सामान्य दिनों में पांच सौ रुपयों में मिलने वाले कमरों का किराया पांच गुना तक क्यों न बढ़े। आखिर इस वर्ग पर क्या फर्क पड़ता है। लंबी छुट्टियां बिताकर दफ्तर पहुंचेंगे और महीना बीतते ही फिर मोटी तनख्वाह खाते में जमा हो जाएगी। फिर सोचता हूं ठीक ही तो है,ये खर्च करते हैं तो उसका बंटवारा समाज में ही तो होता है। किसी न किसी को इसका लाभ तो मिलता है। बीच में त्योहार की चकाचौंध से खुद को बिल्कुल दूर कर लिया था,क्योंकि त्योहार की धमाचौकड़ी के बीच गुबारे बेच रहे बच्चों की कुछ आमदनी हो जाने की उम्मीद में चमकती आंखें और सवारियां ढूंढ रहे रिक्शा चालकों की सजग-चौकस निगाहें मन में अवसाद पैदा करने लगी थी। कोफ्त होती कि,यह भी कैसी खुशी है। एक वर्ग खुशी से बल्लियों उछल रहा है,तो दूसरा कुछ अतिरिक्त कमाई की उम्मीद में बेचैन है। क्या पता उसे इच्छित आमदनी न हो,तब क्या बीतेगी उन पर…। विजयादशमी के हुल्लड़ में मैंने अनेक चिंतित और हैरान- परेशान दुकानदार देखे हैं। जो पूछते ही कहने लगते हैं… क्या बताएं भाई साहब,इस साल आमदनी नहीं हुई,उल्टे नुकसान हो गया…ढेर सारा माल बच गया। हिसाब करेंगे तो पता चलेगा कितने का दंड लगा है। समझ में नहीं आता… अब बचे माल का करेंगे क्या। इस भीषण चिंता की लकीरें बेचारों के परिजनों के चेहरों पर भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है। सचमुच त्योहारों ने संवेदनशील लोगों के दिलों को भारी टीस पहुंचाना शुरू कर दिया है। इस साल विजयादशमी से करीब एक पखवाड़े पहले मेरे छोटे-से शहर में चार बड़े शॉपिंग मॉल खुल गए हैं,जिसमें हर समय भारी भीड़ नजर आती है। माल के कांच के दरवाजे ठेलकर निकलने वाले हर शख्स के हाथ में रंगीन पैकेट होता है,जो उनके कुछ-न-कुछ खरीददारी का सबूत देता है। लोग खरीदें भी क्यों नहीं…,आखिर ब्रांडेड चीजें भारी छूट के साथ मिल रही है। साथ में कूपन और उपहार भी,लेकिन फिर सोचता हूं इसके चलते शहर के उन चार हजार दुकानदारों की दुनिया पर क्या बीत रही होगी, जहां इस चकाचौंध के चलते मुर्दनी छाई हुई है। सचमुच यह विचित्र विरोधाभास है। हर साल हम नए मॉल खुले देखते हैं, वहीं पहले खुले मॉल बंद भी होते रहते हैं। रोजगार से वंचित इनमें कार्य करने वाले बताते हैं कि,मालिकों ने बताया कि भारी घाटे के चलते मॉल को बंद करना पड़ा या फिर बैंकों के ऋण का कुछ लफड़ा था। फिर मस्तिष्क में दौड़ने लगता कि,खंडहर में तब्दील होते जा रहे बंद पड़े वे तमाम मॉल जो कभी ऐसे ही गुलजार रहा करते थे। फिर सोच में पड़ जाता हूं,आखिर यह कैसा खेल है। दुनिया में आने-जाने वालों की तरह इस बाजार में रोज नया आता है,तो पुराना रुखसत हो जाता है।

                                                                     #तारकेश कुमार ओझा

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं | तारकेश कुमार ओझा का निवास  भगवानपुर(खड़गपुर,जिला पश्चिम मेदिनीपुर) में है |

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मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ख़बर हलचल न्यूज़, मातृभाषा डॉट कॉम व साहित्यग्राम समाचार पत्र के संपादक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर में हिन्दी भाषा के प्रचार, प्रसार और विस्तार के लिए निरंतर कार्यरत हैं। लगभग दो दशकों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय डॉ. जैन के नेतृत्व में पत्रकारिता के उन्नयन के लिए भी कई अभियान चलाए गए। आप 29 अप्रैल को जन्मे तथा कम्प्यूटर साइंस विषय से बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग (बीई-कम्प्यूटर साइंस) में स्नातक होने के साथ आपने एमबीए किया तथा एम.जे. एम सी की पढ़ाई भी की। उसके बाद ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियाँ’ विषय पर अपना शोध कार्य करके पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। डॉ. अर्पण ने 35 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हिन्दी में परिवर्तित करवाए, जिसके कारण आपको विश्व कीर्तिमान प्रदान किया गया। अब तक आप 15 पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। इसके अलावा साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 2020 के अखिल भारतीय नारद मुनि पुरस्कार से पुरस्कृत हुए हैं। साथ ही, आपको वर्ष 2023 में जम्मू कश्मीर साहित्य एवं कला अकादमी व वादीज़ हिन्दी शिक्षा समिति ने अक्षर सम्मान, वर्ष 2024 में प्रभासाक्षी द्वारा हिन्दी सेवा सम्मान, वर्ष 2025 में लघुकथा शोध केन्द्र भोपाल द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवा सम्मान तथा वर्ष 2026 में वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ़ एक्सीलेंस, इंग्लैंड द्वारा सम्मानित किया गया है। इसके अलावा आप सॉफ़्टवेयर कम्पनी सेन्स टेक्नोलॉजीस के सीईओ हैं, साथ ही, लगातार समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय सहभागिता रखते हैं। कई दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों व न्यूज़ चैनल में आपने सेवाएँ दी हैं। भारतभर में आपने हज़ारों पत्रकारों को संगठित कर पत्रकार सुरक्षा कानून की माँग को लेकर आंदोलन भी चलाया है। वर्तमान में आप देशभर में हिन्दी आन्दोलन का नेतृत्व करने के कारण हिन्दी योद्धा के रूप में पहचाने जाते हैं।