
देख सीमाओं की दुर्दशा,
लिखे शृंगार हम कैसे आंखे मौन है सब की,
लिखे अंगार हम कैसे कहीं तो रो रहा है कश्मीर,
कहीं हलधर दुखी होते द्रवित मन में प्रेम धन भरकर,
लिखे लाचार हम कैसे हमीं कलमकारों ने हर पल,
राजनीति को चेताया कैसे खुले आंँख शासन की,
लिखें अब ज्वार हम कैसे उमंगे उठ रही मन में जो,
सपूतों के समर्पण से जगाएं देश हित वही प्यार,
लिखे प्रतिहार हम कैसे सीमा के अंदर आतंकी,
जाने कैसे घुस आते
#चंचल पाहुजा

