शिक्षा नीति के संबंध में मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखे गए पत्र

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m l gupta

माननीय,

नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं व संस्कृति आदि से संबंधित सुझाव विचारार्थ सादर प्रस्तुत हैं-

संघ की राजभाषा हिन्दी व राज्यों की भाषाओं का शिक्षण

1.भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिन्दी संघ की राजभाषा है और अनुच्छेद 351 में यह निर्देश है कि संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए,उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।

2.संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित राजभाषा संकल्प–1968 में भी संसद द्वारा यही संकल्प व्यक्त किया गया है-`जबकि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिन्दी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिन्दी  भाषा का प्रसार,वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति  के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके,संघ का कर्तव्य हैl` इसलिए भारत के संविधान के निदेशानुसार एवं संसद द्वारा पारित संकल्प की पूर्ति के लिए हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाने और हिन्दी को भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के लिए यह आवश्यक है कि भारत संघ के सभी भागों में विद्यार्थियों को प्राथमिक स्तर से दसवीं तक निजी

व सरकारी सभी स्कूलों में एक विषय के रूप में हिन्दी भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाए। भारत की एकता,अखंडता व राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में सुदृढ़ करने केलिए भी यह आवश्यक है।

  1. संविधान केअनुच्छेद-345 में राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा विधि द्वारा,उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को या हिन्दी को उस राज्य के सभी या किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं के रूप में अंगीकार करने का उपबंध है। संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित राजभाषा संकल्प–1968 खंड 2 में कहा गया है कि –‘जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिन्दी के अतिरिक्त भारत की 21 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है,और देश की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाए किए जाने चाहिए।‘ अत: जनता को जनतांत्रिक अधिकारों तथा राज्य की सांस्कृतिक विरासत के विकास व संरक्षण के लिए भी राज्य की भाषा अथवा भाषाओं का शिक्षण आवश्यक है।

4.चूंकि संस्कृत भारत की अधिकांश भाषाओं की जननी है और तमाम भारतीय भाषाओं के बीच अटूट संबंध स्थापित करती है। संस्कृत में भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान,आध्यात्म व साहित्य सहित महान वाड्मय निहित है। संस्कृत भारतीय सांस्कृतिक विरासत का मूल आधार भी है,इसलिए स्कूल-कॉलेजों में संघ व राज्य की राजभाषा के अतिरिक्त संस्कृत शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि संस्कृत में उपलब्ध उच्च स्तरीय दुर्लभ ज्ञान-विज्ञान की उपलब्धता के चलते विकसित देशों सहित अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है,लेकिन भारत में ही संस्कृत शिक्षा को समुचित महत्व न मिलने से भारत इस ज्ञान का समुचित लाभ नहीं उठा सका।

5.राजभाषा संकल्प–1968  खंड 3 में देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक माना गया है कि भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के परामर्श से तैयार किए गए त्रि-भाषा सूत्र को सभी राज्यों में कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी उपाय करने को कहा गया है जिसमें हिन्दीभाषी क्षेत्रों में हिन्दी तथा अंग्रेजी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा के,दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए और अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषाओं एवं अंग्रेजी के साथ साथ हिन्दी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबन्ध किया जाना चाहिए। हिन्दी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हों और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें। इसलिए विद्यार्थियों के लिए हिन्दी व अंग्रेजी के अतिरिक्त राज्य की राजभाषा अनिवार्यत: पढ़ाई जानी चाहिए। भाषा शिक्षण की उक्त व्यवस्था निजी स्कूलों आदि पर भी लागू की जानी चाहिए ।

 भारतीय संस्कृति व देश की एकता अखंडता के संदर्भ में भारतीय भाषा शिक्षण

6.भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का साथ है। भाषा जब आती है तो अपनी संस्कृति साथ लेकर आती है और जब जाती है तो अपनी संस्कृति भी साथ लेती जाती है। अगर पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाई जाए या प्रारंभ से ही अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दी जाए और साथ ही भारतीय संस्कृति के संरक्षण की बात की जाए तो यह विरोधाभासी होगा। भाषा अपने साथ अपनी संस्कृति को भी स्थापित करती है। नर्सरी कक्षा से ही अंग्रेजी को घुट्टी में घोलकर पिलाने से भारतीय भाषा और संस्कृति का निरंतर क्षय हुआ है। भारतीय राष्ट्रीयता का आधार इसकी सामासिक संस्कृति है,जिसकी निरंतरता भारतीय भाषाओं से है। इसलिए संघ व राज्यों की भाषाओं का अनिवार्य शिक्षण देश की एकता अखंडता की दृष्टि से भी आवश्यक है।

7.यह भी सत्य है कि जब तक देश में उच्च शिक्षा,विशेषकर विज्ञान व प्रौद्योगिकी की शिक्षा में तथा रोजगार के तमाम क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व रहेगा,अभिभावकों की प्रारंभ से अंग्रेजी शिक्षा व अंग्रेजी माध्यम की माँग बनी रहेगी इसलिए इन बातों को उच्च-शिक्षा व रोजगार से जोड़कर ही आगे बढ़ना होगा।

  विदेशी भाषा शिक्षण

8.देश में पिछले कुछ वर्षों में अनेक स्कूलों में स्कूल स्तर पर संघ की राजभाषा हिन्दी या राज्य की भाषा के स्थान पर विदेशी भाषा का विकल्प दिया जाने लगा है,जिसमें अधिक अंक पाने के आकर्षण का समावेश होता है,जबकि स्कूल स्तर पर फ्रेंच-जर्मन आदि विदेशी भाषाएँ पढ़ने से न तो उन भाषाओं का विशेष ज्ञान होता है न ही वह किसी काम आता है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि अब तक स्कूल स्तर पर विदेशी भाषा शिक्षण से कितने प्रतिशत विद्यार्थियों को रोजगार मिला है या अन्य कोई लाभ हुआ है। अत: स्कूल स्तर पर संघ की या राज्य की भाषा के स्थान पर विदेशी भाषा का विकल्प नहीं दिया जाना चाहिए।

9.वे विद्यार्थी जो गंभीरतापूर्वक विदेशी भाषाएं सीखना चाहते हैं,उनके लिए देश के सभी विश्वविद्यालयों में विदेशी भाषा विभागों के अतर्गत स्तरीय विदेशी भाषा-शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए और इसे प्रोत्साहित भी किया जाना चाहिए।

मातृभाषा माध्यम से शिक्षण

10.देश-दुनिया के सभी विचारकों व शिक्षाविदों का यह मानना है कि मात़ृभाषा में शिक्षा व्यक्ति के विकास के लिए सर्वश्रेष्ठ है। प्राय: सभी विकसित देशों में शिक्षा का माध्यम उनकी अपनी भाषाएं हैं और इसके विपरीत विदेशी भाषा माध्यम वाले ज्यादातर देश अविकसित या विकासशील श्रेणी में हैं। ज्ञान-विज्ञान में शीर्ष देशों ने भी मातृभाषा के माध्यम से ही विकास का सफर तय किया है,लेकिन भारत में ठीक इसके उलट हुआ है। स्वतंत्रता के पश्चात भी देश में ज्यादातर बच्चे मातृभाषा में ही शिक्षा पाते थे लेकिन उच्च शिक्षा व रोजगार को अंग्रेजी के वर्चस्व के बढ़ने के चलते धारा उलटी बहने लगी। पूरे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ मातृभाषा व राजभाषा माध्यम के स्कूल – कॉलेजों को लीलती जा रही है।

  1. भारत सरकार द्वारा विज्ञान-प्रौद्योगिकी सहित विभिन्न क्षेत्रों में नए विचारोंनवोन्मेष और नए आविष्कारों पर जोर दिया जा रहा है। यह एक महत्वपूर्ण व सराहनीय कदम है। यहाँ उल्लेखनीय है कि मौलिक चिंतन हमेशा अपनी भाषा में ही होता है,ऐसे में अंग्रेजी भाषा माध्यम से शिक्षण के जरिए नवोन्मेष   की अपेक्षा करना संगत प्रतीत नहीं होता। अत: दीर्घकालीन नीति द्वारा भारतीय भाषाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा व रोजगार के रास्ते खोलते हुए राज्य की भाषाओं व संघ की भाषा के माध्यम से शिक्षा की व्यवस्था करना आवश्यक है।

12.प्राथमिक स्तर पर विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षण बच्चों के विकास व सीखने की स्वभाविक प्रक्रिया को कुंद कर उन्हें नकलची बनाने की ओर प्रवृत्त करता है। ऐसी शिक्षा व्यवस्था से नवोन्मेष या आविष्कारों की विशेष संभावना नहीं होती। किसी देश के विकास के लिए इससे बड़ी त्रासदी नहीं हो सकती। इसलिए देश में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए। यह व्यवस्था सरकारी-निजी अथवा अल्पसंख्यक श्रेणी आदि सभी तरह के स्कूलों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

अंग्रेजी भाषा-शिक्षण में पाठ्य-सामग्री

13.यह देखने में आया है कि नर्सरी स्तर से लेकर सभी स्तरों पर अंग्रेजी भाषा-शिक्षण में पाश्चात्य संस्कृति को परोसा जाता है। कविताओं व गीतों,कहानियों व अन्य पाठ्य सामग्री में भारत की ऋतुएं,मौसम,नदियाँ,पहाड़,नृत्य,संगीत,पर्व,परंपराएँ,इतिहास,पौराणिक गाथाएँ,संत और महापुरुष न होकर पाश्चात्य देशों के होते हैं। पाठ्य-सामग्री में भारतीय संस्कृति की झलक तक नहीं मिलती। इससे विद्यार्थियों का झुकाव बचपन से ही भारतीय संस्कृति के बजाए पाश्चात्य संस्कृति की ओर होने लगता है और वे पाश्चात्य संस्कृति को भारतीय संस्कृति को बेहतर मानने लगते हैं। यह भारतीय संस्कृति ही नहीं,बल्कि भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के भी अनुकूल नहीं है। अत: सुझाव है कि अंग्रेजी भाषा शिक्षण में विशेषकर स्कूल स्तर पर पाठ्य सामग्री में पाश्चात्य संस्कृति के स्थान पर राज्य व राष्ट्र की संस्कृति का समावेश किया जाए। इसके लिए भारत के अंग्रेजी के उनेक अच्छे लेखक व उनका साहित्य है। उक्त पाठ्य-सामग्री सभी तरह के स्कूलों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

भाषा-प्रौद्योगिकी शिक्षण

भारतीय भाषाओं के प्रयोग किए जाने की सबसे बड़ी बाधा भाषा-प्रौद्योगिकी के उपकरणों में भारतीय भाषाओं की सुविधा का या उसकी जानकारी शिक्षण-प्रशिक्षण तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित न किया जाना है। इसलिए इस संबंध में शिक्षा-व्यवस्था में निम्नलिखित कदम शीघ्र उठाए जाने की आवश्यकता है।

14.कंप्यूटरों व मोबाइल आदि उपकरणों पर भारतीय भाषाओं में कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा निर्धारित अत्यधित सरल और वैज्ञानिक इन्स्क्रिप्ट कुंजी-पटल उपलब्ध है। स्कूल–कॉलेज आदि में इसकी जानकारी न होने के कारण देवनागरी सहित भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखने का चलन तेजी से बढ़ा है। इस मामूली से प्रशिक्षण के अभाव में ज्यादातर भारतवासी अपनी मातृभाषा को अपनी भाषा की लिपि के बजाए रोमन लिपि में लिखते हैं। इस कारण देवनागरी सहित अधिकांश भारतीय भाषाओं की लिपियों का प्रयोग तेजी से घट रहा है। रोमन लिपि में इनके उच्चारण को ठीक प्रकार अभिव्यक्त करने की क्षमता न होने के कारण भारतीय भाषाओं पर भी इनका अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह एक अत्यंत गंभीर समस्या है। इसलिए देश के सभी स्कूलों में माध्यमिक स्तर पर सूचना-प्रौद्योगिकी विषय के अंतर्गत हिन्दी अथवा राज्य की भाषा में इन्स्क्रिप्ट कुंजी-पटल का प्रशिक्षण दिया जाए,जिसे कम समय में अभ्यास से उचित गति के साथ सीखा जा सकता है। इसे परीक्षा का अंग भी बनाया जाए,ताकि गंभीरतापूर्वक से पढ़ा  व पढ़ाया जाए। इससे किसी भी कंप्यूटर आदि पर भारतीय भाषा में मोबाइल आदि पर कार्य किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि,केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड(सीबीएससी) की डॉ. ओम विकास की अध्यक्षता में सूचना-प्रौद्योगिकी व कंप्यूटर शिक्षा के लिए गठित पाठ्यक्रम समिति ने भी कई बार ऐसी सिफारिश की है। यह प्रशिक्षण निजी अथवा सरकारी सभी स्कूलों के पाठ्यक्रम में समान रूप से शामिल होना चाहिए।

15.सूचना-प्रौद्योगिकी शिक्षा से जुड़े सभी शिक्षा संस्थानों में भारतीय भाषाओं से संबंधित भाषा-प्रौद्योगिकी सुविधाओं व विकास कार्यों का समावेश किया जाना चाहिए।इसी प्रकार प्रौद्योगिकी अनुसंधान व विकास कार्यों में भी भारतीय भाषाओं में कार्य सुविधाओं पर कार्य का समावेश होना चाहिए ताकि प्रौद्योगिकी विकास की प्रक्रिया में भारतीय भाषाएं पिछड़ न जाएँ।

16.स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर पर भाषा-शिक्षण के अंतर्गत भाषा हेतु उपलब्ध सूचना प्रौद्योगिकी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि भाषा में स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा पानेवाले विद्यार्थी भाषा-प्रौद्योगिकी के प्रयोग में भी पारंगत हों।

 

विधि शिक्षा

17.जनता को अपनी भाषा में कानूनी प्रक्रिया की सुविधा व न्याय मिल सके,इसके लिए विधि शिक्षा के लिए संघ-राज्य की भाषा में विधि की शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि विधि शिक्षा भारतीय भाषाओं में न होने के कारण निचली अदालतों में स्थानीय भाषा के प्रावधान के बावजूद कार्य भारतीय भाषाओं में नहीं हो पाता।

 

 देश –प्रेम की भावना का विकास

18.आज से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व तक बच्चे जो आज प्रौढ़ या वृद्ध हो चले हैं,वे देश-प्रेम की भावना से ओत- प्रोत होते थे,क्योंकि उस समय पाठ्य पुस्तकों में देश-प्रेम की पाठ्य-सामग्री प्रचुर मात्रा में होती थी। बाद  में विशेषकर अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों की बाढ़ के पश्चात  बाद धीरे-धीरे पाठ्य पुस्तकों से देश-प्रेम की पाठ्य-सामग्री गायब होती गई। इसके परिणामस्वरूप बाद की पीढ़ियों में  देश-प्रेम की वैसी भावना अब  कम ही देखने को मिलती है। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से स्कूली पाठ्यक्रम में विशेषकर  प्राथमिक व माध्यमिक कक्षाओं में देश-प्रेम की भावना जागृत करनेवाली पाठ्य-सामग्री का समावेश किया जाए।

 

19.इसी प्रकार पहले बच्चों को अनेक देश-प्रेम के गीत व कविताएँ याद होती थीं,लेकिन अब यह देखने में आता है कि प्राय: बच्चों को देश-प्रेम के गीत व कविताएँ बिल्कुल नहीं आती। इसलिए सरकारी व निजी स्कूल सभी के लिए प्रतिदिन कक्षाएँ प्रारंभ होने के पूर्व प्रार्थना के समय राष्ट्रगान और देश-प्रेम के कोई दो गीतों का देश की भाषाओं में गायन अनिवार्य किया जाए। इसी प्रकार स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस आदि राष्ट्रीय त्यौहारों पर भी भारतीय भाषाओं में देश-प्रेम के गीतों,कविताओं के गायन,एकांकी,नाटक आदि मंचन के कार्यक्रम  आयोजित किए जाने संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ। अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूल अक्सर इससे बचते हैं,अत: उन पर कड़ी नजर रखी जाए कि वे ऐसे निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें।

                                                     #साभार–डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।