फेसबुकिया मॉम

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geeta
अगस्त माह का पहला रविवार हैl सुबह-सुबह का झुटपुटा हैl  अभी वृक्ष सोए पड़े हैंl  डालियाँ पंछियों की चहचहाहट सुनने के लिए आतुर हैं,लेकिन कहीं कोई आवाज़ नहीं,केवल एक आवाज़ को छोड़कर बादलों की गर्जन-तर्जन कभी तेज-कभी धीमी,कभी बिजली कड़कने की ज़ोर की आवाज़ हैl शायद बारिश होने वाली हैl मुझे बारिश बहुत पसंद हैl  अच्छा है दिल्ली को गर्मी से कुछ तो राहत मिलेगीl
आहा!!! कहीं लॉन्ग ड्राइव पर जा सकते हैं,यह सोचते ही मन में गुदगुदी होने लगीl
सब सो रहे हैं या सोने का उपक्रम कर रहे हैंl पूरा हफ्ता गहन अवसाद में व्यतीत हुआl राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की मृत्यु से मन अभी तक अशांत हैl ऊपर से आतंकी याकूब मेनन को फाँसी..पता नहीं,क्या गलत है और क्या सही लेकिन मृत्यु तो मृत्यु है वो चाहे किसी की भी हो मन को पीड़ित करती हैl
मुझे नींद नहीं आ रही,वर्ना मैं भी घोड़े बेचकर सोती हूँl छुट्टी का यह एक दिन ऐसा होता है,जब केवल आराम से सोने का मन करता हैl रोज़ाना की भागदौड़ से अलग कुछ पल अपने लिए और कुछ अपनों के लिए बिताने का मन, सैर सपाटे का,मॉल या मूवी जाने का मन होता हैl  मेड को भी इस दिन देरी से आना होता है,लेकिन आश्चर्य है न आज मैं दिन निकलने से भी पहले उठ गईl अब तो कॉफ़ी भी खुद बनानी होगीl
कॉफी पीकर भी रिक्तता कम नहीं हो पा रही हैl यूँ तो मेरे सिरहाने पर कई पुस्तकें रखी हैं,लेकिन पढ़ने का मन नहीं हैl संगीत सुन सकती हूँ जो मुझे हमेशा ही तरोताज़ा कर देता है,लेकिन इतनी सुबह वो भी नहीं,सब परेशान हो जाएंगे और ईयर फोन लगाकर सुनना नहीं चाहती,तो क्या किया जाएl
ऐसे में लेपटॉप पर बैठकर सोशल साइट्स पर जाना उचित हो..यह सोचकर लेपटॉप वहीं बेड पर लेकर बैठ जाती हूँl
सबसे पहले अपना ई-मेल चेक करती हूँl फेसबुक खोलकर अपनी प्रोफाइल पर जाती हूँ,स्टेटस लिखने का मन नहीं है इसलिए फेसबुक के होम पेज़ पर जाकर यूँ ही घूमने लगती हूँ,तभी एक स्टेटस पर निगाह देर तक अटकी रह जाती है—कुछ टूट रहा है भीतरl वह जानती है लेकिन कुछ कर नहीं पा रहीl टूटन कहाँ नहीं है? हर रोज़ हर घड़ी,कुछ न कुछ टूटता हैl आशाएँ टूटती हैं,इच्छाएँ टूटती हैं,रास्ते टूटते हैं,मंजिलें टूटती हैं,रिश्ते-नाते टूटते हैं,प्रेम टूटता है यानि ज़िंदगी टूटती है,ज़िंदगी रूठती हैl ज़िंदगी का रूठना-टूटना आप जानते हैं न,क्या होता हैl
ज़िंदगी की टूटन सपनों को तोड़ती हैl सपनों की टूटन ज़िंदगी को सजायाफ्ता सड़कों पर धकेल बंजारन बना देती है जहाँ दिन में रात होती है और रात को सूरज पहरा देता हैl रात की रानी मुरझा जाती है और कुम्हला जाती है सुबह की वो कोमल कली,जो नीची नज़रें किए खामोश पड़ी रहती है,जिसको स्कूल जाते बच्चों को गुड मोर्निंग कहना होता हैl ऑफिस जाते हुओं को बाय-बाय बोलना होता हैl  भोर पंछियों का कलरव भूल जाती है,डालियाँ उदास मुँह लटकाए बैठी रहती हैं और पत्ते चुपचाप सुन्न पड़े रहते हैंl हवा बावरी होकर कहीं गुफा में जाकर घुटनों के बल बैठ जाती है जैसे प्रार्थना कर रही होती है यह कहते हुए कि-मैं तो पुरवाई हूँ,जीवन दायिनी संजीवनीl बहना चाहती हूँ,आओ मेरे पंखों पर सवार हो जाओl उड़ो मेरे साथ निर्द्वंद होकर,लेकिन उसकी प्रार्थनाएं कोई नहीं सुन रहाl हर ओर नीरवता,हर तरफ केवल सन्नाटा ही सन्नाटाl
पढ़ते-पढ़ते मन काव्यमय हो जाता है,पर आँखें नम होने लगती हैंl चाहकर भी कमेंट्स नहीं लिखती और अगले स्टेट्स की तरफ बढ़ जाती हूँ–
मैं अक्सर सोचा करती हूँ कि आख़िर कौन है,जो इस शोरगुल में भी नीरवता भर जाता हैl क्यों करता है वह ऐसा? इतनी भीड़ के होते हुए भी क्यूँ जीवन ऐसे निरापद और एकाकी हो जाते हैं? क्या किसी के पास कोई उत्तर है?
मैं अपने आपसे कहती हूँ-नहीं है कोई भी उत्तरl
आज सुबह-सुबह ये उदासी भरे स्टेट्स पढ़कर मन और भी व्यथित हो जाता हैl मैं और आगे बढ़ती हूँ..और कोई स्टेट्स विशेष नहीं लग रहा,लेकिन तभी एक स्टेट्स पर आँख ठहर जाती हैl
मुझे विश्वास नहीं होता,मैं उसे दोबारा-तिबारा-चौबारा पढ़ती हूँ-
‘मोना अब हमारे बीच नहीं रहीl उसने हॉस्टल की चार मंजिली इमारत से कूदकर आत्महत्या कर ली’..क्या!!!!! अनायास मेरे मुँह से निकलता हैl
क्यों?
किसलिए?
कब?
अनेक प्रश्न एक साथ मेरा पीछा करने लगते हैंl दिमाग भन्नाने लगता हैl
आत्महत्या? वह आत्महत्या कैसे कर सकती है?
क्या हुआ है उसके साथ?
कहीं… ओह नहीं…l
जाने कैसे-कैसे विचार आने लगते हैंl फिर भी चाहे कुछ भी हो,कोई भी कारण ज़िंदगी से बड़ा तो नहीं हो सकताl  आत्महत्या क्या किसी भी समस्या का समाधान हो सकती हैl
मोना! क्यूँ किया तुमने ऐसा? मैं थी न,तुम मुझसे बात कर सकती थींl मुझे क्यूँ तुमने अपनी परेशानी में शामिल नहीं किया? एक बार कहकर तो देखतीl
ओह!!!! निरीह असहाय अवस्था में मैं अंदर ही अंदर छटपटाने लगती हूँl बेबसी में इधर-उधर देखती हूँl कोई दिखाई नहीं देता सिवाय मोना केl
मोना,मेरी फेसबुक मित्र थीl मैं अनजान लोगों को अपने साथ नहीं जोड़ती,लेकिन मोना ने संदेश दे-देकर मुझे मजबूर कर दिया और मुझे उसे फ्रैंड लिस्ट में शामिल करना पड़ाl अगले दिन एक अजीब-सी घटना घटीl
हुआ यूँ कि,मोना ने अपने स्टेट्स पर मराठी कविता पोस्ट कीl मुझे टैग करने के बाद उसने मुझे सन्देश दिया–
मॉम! आप मेरा स्टेट्स अवश्य पढ़ेंl
मॉम!!!यह संबोधन पढकर मैं चौंकीl
किसी भी रिश्ते को नाम देना क्या जरूरी हो जाता हैl क्या बिना नाम के संबंध,संबंध नहीं होते?
क्या मित्र शब्द अपने-आप में पर्याप्त नहीं?
उसने मुझे `मॉम` क्यूँ कहा?
वह मेरे नाम के आगे जी लगा सकती थी,अगर और भी अधिक सम्मान देना चाहती थी,तो दीदी कह सकती थी लेकिन मॉम!!! क्यों कहा?
मैं थोड़ा असहज हो गई थीl मैंने उसे सन्देश दियाl
मोना! आप मेरी मित्र हैं,इसलिए मित्र बनी रहेंl मेरा एक नाम है जो बुरा नहीं है,अगर आप मुझे मेरे नाम से बुलाएंगीं तो मुझे अच्छा लगेगाl
उसने कोई उत्तर नहीं दियाl मैं समझी उसने मेरी बात स्वीकार कर ली हैl
अगले दिन उसने गुजराती कविता पोस्ट कीl फिर मुझे टैग किया उसी तरह के सन्देश के साथ–
`मॉम! आप गुजराती मराठी दोनों भाषाएँ जानती हैं,आपने अपनी प्रोफाइल में लिखा हैl आपके लिए विशेष रूप से यह कविता,जरूर पढ़ें मॉमl`
सच कहूँ तो,मैं इस तरह के किसी भी रिश्ते पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थीl
मैं जानती थी कि यह आभासी दुनिया है,जहाँ केवल प्रोफाइल द्वारा जान-पहचान होती हैl कई बार पहचान तक झूठी  होती है,जेंडर तक गलत होता हैl
मैंने उसे फिर सन्देश दियाl
`मोना!!! ये क्या है? तुम मुझे मॉम क्यों कहती हो? मॉम बड़ा प्यारा रिश्ता हैl इसकी अपनी मर्यादाएं हैंl यह संबंधों की वह पराकाष्ठा है,जहाँ जीवन भी घुटने टेककर चरणों में झुक जाता हैl मैं तुम्हें नहीं जानतीl तुम भी मुझे नहीं जानतीं,फिर ये संबोधन क्यों?`
वह चुप रही,लेकिन लगातार मॉम कहती रहीl
मैंने उसकी प्रोफाइल पर जाकर देखा,वहाँ उसकी एक भी फोटो नहीं थीl वह इंजीनियरिंग की छात्रा थीl मुम्बई के किसी हॉस्टल में रहती थीl कॉलेज का नाम भी नहीं थाl मैंने उसके स्टेटस पढ़ेl वहाँ केवल वही कविताएं थीं,जिनमें  उसने मुझे टैग किया था और केवल मुझेl उन पर मेरे अलावा कोई लाइक या कमेन्ट भी नहीं थाl
मैं सोच में पड़ गई कि,केवल मुझे ही क्यों? उसके केवल दो मित्र थे,लेकिन स्टेट्स पर उनके पदचिन्ह नहीं थेl  इसे देखकर मेरे मन में कई प्रश्न उठेl
क्या वह बहुत अकेली थी?
क्या उसकी मॉम नहीं थीं!
हो सकता है मुझे देखकर उसे अपनी मॉम का अहसास होता होl
या मॉम और पापा अलग रहते हों,तो वह डिप्रेशन की शिकार हो,इसलिए मुझे मॉम कह रही होl
ओह!!! मेरे पास प्रश्न ही प्रश्न थेl उत्तर केवल वह दे सकती थी,लेकिन उसने देने नहीं चाहेl
कई बार उसने मुझसे बिना इजाजत लिए मेरी कविताओं का मराठी और गुजराती में अनुवाद भी कियाl मुझे अच्छा लगाl धन्यवाद देते हुए मैंने उसे सन्देश दिया और बात करने की इच्छा व्यक्त कीl
हालांकि,मैं बात(चैट) करना पसंद नहीं करती हूँ,मगर मोना में कुछ ऐसा था जो मुझे बार-बार उसके विषय में जानने के लिए उकसा रहा थाl मोना चुप रहीl उसने न तो उत्तर दिया,और न ही अपना फोन नं. दियाl हाँ,कविताएं लगातार पोस्ट करती रहीl टैग भी करती और मॉम कहकर कविता पढ़ने के लिए सन्देश भी देती रहीl
मैं मित्र होने से पहले एक स्त्री भी थी और मैं देख रही थी कि मेरे भीतर की स्त्री अब पिघलने लगी हैl आभासी दुनिया की दीवार ढहती जा रही है और मोना मेरे व्यक्तिगत क्षेत्र में सेंध लगाती जा रही हैl मैं बराबर उसे देख रही थी,लेकिन जाने क्यों उसे रोकने की कोशिश नहीं कर रही थी जैसा कि शुरुआती दिनों में किया करती थीl
इस आभासी दुनिया के अँधेरे-उजालों से अच्छी तरह परिचित होने के बावजूद जाने ये कैसा अहसास था,जो मुझ पर हावी होता जा रहा थाl
एक अजीब-सा बदलाव मैं अपने अंदर महसूस कर रही थीl
अजीब तो था,लेकिन कहीं भीतर अनिर्वचनीय सुख की अनुभूति भी हो रही थीl मेरे बार-बार आगाह किए जाने के बाद भी मेरे अंदर की स्त्री उस सुख से वंचित होने के लिए तैयार नहीं थीl उसका लगातार मॉम कहना मेरे अंदर की स्त्री को अब भाने लगा थाl वह एक माँ की तरह उसे प्यार करने लगी थीl उसकी चिंता करने लगी थीl हर रोज़ उत्सुकता रहती और प्रतीक्षा भी कि,आज वह मुझे मॉम लिखने के साथ-साथ कुछ और भी लिखेगीl अपने मन की गुत्थियों को मेरे समक्ष खोलेगी,जैसे बच्चा अपनी माँ के सामने खोलता हैl
कहते हैं स्त्री प्रेम है,ये पूरी की पूरी कायनात उसी के प्रेम पर टिकी हैl सदियों से पीड़ित होने के बावजूद भी वह अपने इस मूल तत्व को नहीं छोड़तीl वह सृष्टा है,हर तकलीफ सहकर भी सृष्टि को जन्म देती हैl जानते हैं आप,गर्भ की पीड़ा क्या होती है?
अगर नहीं जानते,तो पूछिए किसी स्त्री से,वह सुनाएगी इस मर्मान्तक पीड़ा को झेलने का राग,जो उसने अपने ही जैसी किसी दूसरी स्त्री से सीखा होगाl मेरे अंदर की स्त्री इस दर्द को सहने का मन बना चुकी थीl इस पीड़ा में भी वह आनंदित हो रही थीl सच तो यह था कि वह मेरे गर्भ में उसी दिन आ गई थी जिस दिन उसने मुझे मॉम कहा था l धीरे-धीरे प्रेम पनपता रहाl अब नौ महीने बाद उसे जन्म लेना थाl वह मेरे गर्भ में बढ़ रही थीl उसका जन्म निश्चित था,वह मेरी मानस पुत्री थीl मैं माँ यशोदा थी,यानि प्रेम का वो दिव्य स्वरूप जो किसी भी स्त्री को सम्पूर्ण स्त्री बनाने में सर्व सिद्ध साबित होता हैl मेरे अंदर की स्त्री मुस्करा रही थी,वह पूर्ण होने जा रही थीl अपने मातृत्व पर उसका इठलाना मैं देख रही थीl
‘बेगम का तकिया’ उपन्यास का एक वाक्य याद आ रहा है–
‘आदमी जिससे बाबस्ता है’ उसी से परेशान भी हैl’
कितना सही है और सही ये भी है कि,स्त्री परेशानियों से नहीं डरती,इसलिए चाहे कोई भी रिश्ता हो,वह टूटकर प्रेम करती हैl मैं भी कर रही थी उस एक अनजान लड़की से,जिससे मैं कभी नहीं मिलीl जिसकी तस्वीर तक मैंने नहीं देखी,जिसके विषय में मैं कुछ नहीं जानती,उससे प्रेम करने लगीl उसे बेटी समझने लगी और स्वयं को उसकी मॉमl
ताज्जुब,यह बात जितनी सुखकर और आनंददाई है,उतनी ही पीड़ादाई और दुखद भीl
मेरी चेतना लक्ष्मण रेखा बन जाती,मगर मेरी ममता उसके पार जाने का साहस कर चुकी थीl उस समय मैं केवल स्त्री थी और स्त्री के दुस्साहस पर अवाक भीl
लगता था जैसे किसी ने सम्मोहित कर दिया हैl उधर से केवल ‘मॉम’ शब्द जादू का काम कर रहा थाl इधर मेरे अंदर की स्त्री पूर्णता प्राप्त करते-करते यह भूलती जा रही थी कि,फेसबुक एक आभासी दुनिया है जहां कुछ भी हो सकता है लेकिन वह तो मोना से मिलने के मंसूबे बना रही थीl इस बार मुम्बई ज़रूर जाना है,एक बार देखना है मेरी मानस पुत्री कैसी दिखती है? उससे मिलना है,उसके मन की गुत्थियों को खोलना है,मॉम कहने के पीछे के रहस्य से पर्दा उठाना हैl उसे ढेर सारा प्यार करना हैl एक ही धुन उससे मिलने की मन में व्याप्त हो गई थीl
बेटी की माँ होने का सुख केवल वही जान सकता है,जिसने बेटियों से प्रेम किया हैl
ओह! जब मैं प्रसव पीड़ा से गुजर रही थी,तभी ये गाज गिर गईl
‘मोना अब नहीं रही`, मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी कोख पर जोर से लात मारी दी हो और मेरा गर्भ गिर गया होl
मेरे अंदर की स्त्री जोर से चीखती है,दहाड़ मारकर रोती है,लेकिन कोई नहीं सुन पाताl  मेरी चीख,मेरी आवाजें,मेरा दर्द लौटकर मुझ तक वापस आ जाता हैl
अब किससे मालूम करूं? उसका और मेरा कोई आपसी दोस्त भी तो नहीं हैl मेरे पास उसका नम्बर नहीं,कोई पता-ठिकाना नहींl केवल मुम्बई नाम से इतने बड़े शहर में उसका पता लगाया जाए भी तो कैसे? उसने आत्महत्या क्यों की,यह प्रश्न मुझे बार-बार परेशान कर रहा थाl
क्या यह प्रेम का मामला हो सकता है?
प्रेम में धोखा या ऑनर `किलिंग` का मामला तो नहीं,जिसने उसे आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया हो?
उफफ्फ्फ्फ़…..कितना वीभत्स और भयानक है यहl अपने ही बच्चों पर ज़ुल्म ढाते हुए उनकी आत्मा नहीं कांपतीl
हो सकता है यही हो,और यह सोचकर मैं सिहर उठती हूँl
अचानक मुझे ख्याल आता है कि,मोना की दो मित्र भी तो थींl उन्हें सन्देश देना चाहिए,क्या पता कुछ सुराग मिल जाएl
मैंने दोनों को कई सन्देश दिए,लेकिन कोई उत्तर नहीं मिलाl
सच कहूं तो मन बावला होता है,वह कहीं नहीं रुकता,अपितु बार-बार बहुत सारे नए-नए संशयों से भर जाता हैl
मैं लगातार सोचे जा रही थीl क्या पढ़ाई सम्बंधित कोई परेशानी इसकी वजह हो सकती है? या फिर कहीं-कोई छेड़छाड़ या बलात्कार का मामला तो नहींl रेप ओह!!! एक ऐसी घिनौनी हरकत है,जो समय के माथे पर काला धब्बा बनकर उभरती है जहां सूरज भी निकलने से शर्माता हैl
आए दिन होने वाली ये घटनाएँ समाज के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा ही नहीं जड़तीं,बल्कि सभ्य होते हुए हमारे समाज में असभ्यता के सारे दायरे तोड़ती हुई जंगली जानवरों का नग्न नृत्य भी दिखाती हैंl सत्ता का खोखलापन दिखाती हैं, न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैंl
आह!!!!! ये दुष्कृत्य कुत्सित ही नहीं,घृणित भी हैl सृष्टि की रचना करने वाली आधी आबादी का यूँ अपमान,ये हश्र सोचते ही इतिहास में काले पन्नों में दर्ज अनेक तारीखें आँखों के आगे से गुजरने लगींl
दामिनी १६ दिसम्बर २०१२  और उसके बाद की अनगिनत घटनाएं,जहां उम्र, घर,बाहर,समय,रिश्ते सब बेमानी हो गएl कहीं मोना के साथ तो ऐसा नहीं हुआ? मेरी पसलियाँ तक कराहने लगींl एक कंपकपी सारी देह में फैल गईl
ओह!!! अगर हुआ भी हो तो हादसा समझकर आगे बढ़ना चाहिए थाl न्याय के दरवाज़े पर बेशक सांकल चढ़ी थी,फिर भी थपथपाना चाहिए था जोर-जोर से बार-बारl कभी तो उसकी आँख पर बंधी काली पट्टी हटतीl आत्महत्या से क्या हासिल होगा?या कहीं किसी ने उसे छत से धक्का तो नहीं दे दिया?
क्या वह तनाव में थी?
आह!!!!! कहाँ से लाऊँ इन सब प्रश्नों के उत्तर?
जाने कैसी पीड़ा से गुजरी होगीl जाने क्या हुआ होगा?
आत्महत्या कोई यूँ ही तो नहीं करता,सोच-सोचकर जैसे मैं पगलाए जा रही थीl काश!!!! मुझसे कह पातीl
काश! मुझसे कह देतीl
मुझे `मॉम` कहती थी तो मुझे अपने दुःख में भी शामिल करना चाहिए थाl
यह कैसा संबंध,जहाँ एक तरफ बाहरी परिकोष्ठ में निर्लिप्त चुप्पी के साथ अजनबीपन का दूर तक फैला हुआ एक विस्तृत आकाश था,वहीं दूसरी तरफ भीतर एकाकार समभाव से उत्पन्न एक ऐसा साम्राज्य था,जहाँ अद्वैत था,रगों में दौड़ता हुआ प्रेम का,ममता का सैलाब था,प्रसव वेदना थी,बेचैनी थीl एक ऐसी पीड़ा थी जिसे केवल मैं अनुभव कर रही थीl
वहाँ इस समय मोना थी केवल मोना मेरी बेटी और मैं उसकी मॉमl मैंने फेसबुक पर आना-जाना कम कर दियाl वहां कोई मुझे बहन कहता या दीदी कहकर पुकारता,तो मैं सतर्क हो जाती और अपने-आप में सिमट जातीl किसी से बात नहीं करतीl
क्योंकि,इन सब बातों से मुझे मोना याद आती जिसने मुझे `मॉम` कहा और यूँ ऐसे बिना मिले अपनी मॉम को छोड़कर चली गई..तो कैसे?
मैं उदास रहने लगी,पढ़ना–लिखना भी अच्छा नहीं लगता थाl  सब उदासी का कारण पूछते मैं कह नहीं पातीl
कहूँ भी तो क्या…? कौन विश्वास करता इस आभासी रिश्ते की ममता पर,उस गर्भ-पात पर या उस मर्मान्तक पीड़ा पर,जो मैंने सही,जो मेरे अंतस ने झेली,जो चुपके से मेरी अंतड़ियों में समा गईl इतना लाचार,इतना निरीह मैंने अपने आपको पहले कभी महसूस नहीं कियाl यह सही था कि मेरे कोई बेटी नहीं थीl मोना ने मुझे बेटी की माँ होने का अहसास कराया और ये अहसास भी कराया कि बेटी का होना और बेटी का बिछड़ना क्या होता हैl
मुझे इस बात की पीड़ा हमेशा सालती रही कि, मैं अपनी उस फेसबुकिया बेटी के लिए कुछ भी नहीं कर पाई,लेकिन दूसरी बेटियों के लिए तो कुछ कर सकती थी,मगर क्या और कैसे?
मैं रात-दिन बेचैन रहने लगीl एक अजीब-सी बेचैनी मुझे दिन-रात घेरे रहती और उससे निकलने का उपाय मैं सोच नहीं पाती थीl
जितना सोचती और उलझती जातीl
मेरी सोच केवल एक तरफ ही जा रही थी कि, आख़िर मोना जैसी जवान लड़कियों को,जो देश का भविष्य हैं,आत्महत्या क्यूँ करनी पड़ती है?
जीवन से अधिक प्रिय कुछ नहीं होता,फिर वे कौन-कौन से कारण हो सकते हैं जिनकी वज़ह से उन्हें इतना सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है ?
बस मैं इन कारणों की खोज में लग गईl अखबार,मैगज़ीन,टी.वी.और वेब सब में मेरी नजर एक ही समस्या पर टिकी रहतीl
मेरे अंदर एक मंथन लगातार चलता रहाl
धीरे-धीरे मुझे आभास हुआ कि,ये कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है,यह तो एक आग है जिसमें जौहर करती लड़कियाँ-बच्चियां किसी-न- किसी रूप में मेरे सामने से गुजरने लगीं और टी.वी.,समाचार-पत्र सब इस दुःख के गवाह बनने लगेl
कोई आत्महत्या कर रही थी तो,कोई आत्महत्या के लिए मजबूर की जा रही थीl अब स्त्री अपनी पूरी पीड़ा और दर्द के साथ मेरे सामने खड़ी थीl
कोई अपनों की सताई हुई तो कोई बाहर की मारीl
उसकी सुनने वाला या उसको समझने वाला कोई नहीं थाl बेटी का जन्म ही दुष्कर थाl  कोख में ही मारा जाना मुझे और भी उदास कर जाताl मैं कई-कई मौत एक साथ मरने लगीl
फिर खाप थीं,पंचायतें थीं लेकिन वह उनके सामने निहत्थी,बेबस,पढ़ने-लिखने और अपने पैरों पर खड़े होने के बावजूद बंधक..ओह!!! मेरा कलेज़ा मुंह को आ गयाl मैं यह सोच ही रही थी कि,मोना की मित्र का फेसबुक पर सन्देश  मिलाl मुझे अचानक झटका-सा लगाl इतने दिन बाद…जाने क्या लिखा होगा! हिम्मत करके मैं आश्चर्य के साथ इनबॉक्स में गईl  लिखा था-
आप मोना की `मॉम` हैंl मैं जानती हूँ,आप बहुत परेशान हो रही होंगी,इसलिए बस इतना बता पाऊँगी कि वह एक गाँव के प्रधान की बेटी थीl किसी से प्रेम करती थी,जब यह बात उसके पिता को पता चली तो उन्होंने उस लड़के को गायब करवा दियाl वह ज़िंदा भी है या नहीं, किसी को नहीं मालूमl और मोना को पढ़ाई-लिखाई छोड़कर गाँव आने के लिए कहाl वह जानती थी कि गाँव में पहुंचते ही किसी के भी साथ ज़बरदस्ती उसका विवाह करवा दिया जाएगाl इसके लिए वह तैयार नहीं थी,बस उसने किसी को भी बिना बताए अपने जीवन का अंत कर लियाl आह!!!पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें डबडबाने लगींl शब्द धुंधले पड़ गए और मैं अपने को अपंग-सा महसूस करने लगीl थोड़ी देर पहले मैं `ऑनर किलिंग` के विषय में ही तो सोच रही थी,मेरा शक ठीक निकलाl प्रेम जो जीवन को खूबसूरत बनाता है,आज हम उसी के दुश्मन हो गएl जात-पात,ऊँच-नीच के चक्कर में अपनों की बलि देते हुए हमें जरा भी लज्जा नहीं आतीl
मेरे पास कई प्रश्न थे,जो मैं मोना की मित्र से पूछना चाहती थी लेकिन,कड़वाहट और पीड़ा ने मुझे मूक बना दियाl स्त्री तो दुःख का पर्याय है और मैं कबूतर की तरह आंख बंद किए अब तक क्या कर रही थी? धिक्कार है मुझ पर,
ऐसा नहीं कि मैं स्त्री की समस्याओं से परिचित नहीं थीl मैं भी स्त्री थी और स्त्री के अंतर्द्वंद को अच्छी तरह जानती थीl हाँ,इतनी गहराई से कभी सोचा नहीं,और शायद आज भी नहीं सोचती,अगर मोना मेरी ज़िन्दगी में न आई होतीl उसके जाने से मुझे बार-बार आभास होने लगा कि,मैं असंख्य टुकड़ों में खंडित हो गई हूँ और कोई भी मूर्तिकार अब मुझे जोड़ नहीं पाएगा,लेकिन मैं गलत थीl मुझे मोना के प्रेम ने तोड़ा,तो उसी के प्रेम ने फिर से जोड़ा भीl  कहते हैं समय सबसे बड़ा चितेरा हैl वह कब क्या रच दे,आप जान भी नहीं सकतेl मैं व्यग्र और व्यथित थी,चिंतित भीl स्त्रियों के लिए कुछ सार्थक करना चाहती थीl अब ऐसे हाथ पर हाथ धरे बैठना मेरे लिए सम्भव नहीं थाl धीरे-धीरे मैं ऐसी समाजसेवी संस्थाओं से जुड़ने लगी जो बेटियों को बचाने के लिए विशेष रूप से कार्य कर रही थींl मैं भी सामाजिक कार्यकर्ता बन गई  और धरातल पर उतरकर कार्य करने लगी,लेकिन यही पर्याप्त नहीं थाl यह सोचकर मैंने ‘बेटी बचाओ’ अभियान प्रारम्भ कियाl झुग्गी-झोपड़ी से लेकर स्कूल-कॉलेज तक में कार्यक्रम करने शुरु कर दिएl एक वेबसाईट बनाई,जिसका नाम रखा `मॉम`,जहाँ कोई भी पीड़ित लडकी या स्त्री मुझसे अपनी पीड़ा नि:संकोच बाँट सकती थीl और मुझे खुशी थी कि,वे अपनी पीड़ा मुझसे बाँट रही थींl
हर पीड़िता में मुझे मोना नजर आती और मैं हर सम्भव उसकी सहायता के प्रयास करतीl
अब मुझे अच्छा लग रहा थाl जब मैं केवल एक बेटी की मॉम थी,लेकिन अब `जगत मॉम` बन गई थीl
यह देखकर,महसूस कर मेरे अंदर की स्त्री जो अब पूरी तरह से मॉम बन चुकी थी,कुछ सुकून में थी और गुनगुनाने लगी थीl आज सारी बेटियाँ मेरी अपनी हैं और मैं सबकी मॉमl मोना !!!!देख रही हो न अपनी `फेसबुकिया मॉम` को, जिसे तुमने सबकी मॉम बना दियाl
                                                                              #गीता पंडित
परिचय: गीता पंडित दिल्ली में २ प्रकाशन की सम्पादक हैं। आपका जन्म हापुड़ (उ.प्र.)में हुआ है और निवास वैशाली,गाज़ियाबाद (उ.प्र.)है। एमए (अँग्रेजी साहित्य ) सहित एम.फिल( लिंग्विस्टिकस )और एमबीए (मार्केटिंग),कम्प्यूटर डिप्लोमा की शिक्षा हासिल है। मन तुम हरी दूब रहना(काव्य संग्रह ),मौन पलों का स्पंदन(गीत- नवगीत संग्रह )और अब और नहीं बस (गीत-नवगीत संग्रह ) आदि प्रकाशित कृतियाँ आपके नाम हैं। सम्पादन (अतीत के पाँव, मुमकिन तो है तथा गली गंवारिन आदि) भी किया है। संकलन के अतिरिक्त कविताएं, गीत,लघुकथाएं व लेख वेब और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। आप इला त्रिवेणी सम्मान २०१२ प्राप्त कर चुकी हैं।

 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।